Special Story


इंफोसिस कंपनी छोड़कर गुलाब की खेती शुरू की, दो महीने में 30 लाख रु. कमाए

किसानों का रुझान डच गुलाब की खेती की ओर बढ़ा है। उच्च शिक्षित युवा भी गुलाब की खेती करने लगे हैं। बीगोद निवासी आशुतोष पारीक ने बीटेक कर जयपुर में इंफोसिस कंपनी में 12 लाख के पैकेज पर नौकरी की। कुछ समय बाद नौकरी छाेड़कर खेती करना शुरू किया। पैतृक जमीन पर पारंपरिक खेती करते हुए सब्जियां उगाई। आशुतोष ने दो साल पहले फूलों की खेती शुरू की। डेढ़ एकड़ के पॉलीहाउस में 45 हजार पौधे फूलों के लगाए। इनमें रेड रोज, व्हाइट रोज, येलो रोज, औरेंज रोज आदि अलग-अलग किस्म शामिल हैं। इस साल जनवरी व फरवरी में करीब 30 लाख रुपए की आय हुई। पढ़ाई के साथ जाता था कृषि कार्यशालाओं में : आशुतोष ने बताया कि पढ़ाई के दौरान मैंने खेती से जुड़ी कार्यशालाओं में भी हिस्सा लिया। इसलिए मैंने वर्ष 2016 में नौकरी छोड़कर खेती करने का मन बनाया। मेरे इस निर्णय से परिवार के लोग खुश नहीं थे। नौकरी छोड़कर खेती करना उन्हें पसंद नहीं था। उनका कहना था कि खेती घाटे का सौदा साबित होती है। मैंने उन्हें तैयार कर लिया। परंपरागत खेती की जगह आधुनिक खेती शुरू की। अब खेती से अच्छा मुनाफा मिलने पर परिवार के लोग मेरे निर्णय से खुश हैं। पॉली हाउस में पहले खीरा-ककड़ी बोई। इसके बाद गुलाब की खेती शुरू की। बीगोद के फूलों की डिमांड जयपुर और अजमेर में ज्यादा है।

हरिभाई ने कोठासूज के साथ दीवाडांड़ी बनाई: रोज़, सुअर द्वारा संरक्षण होता है।

जूनागढ़ जिले के भेसान तालुका के खंभालिया गाँव के एक प्रयोगात्मक किसान हरिभाई थुमर ने अपनी कोठासुज से एक अनोखी दीवाडांड़ी बनाई है। इस दीवाडांड़ी की मदद से रोज़, सुअर समेत जानवरों ने उनके खेतों में आना बंद कर दिया है। इस दीवाडांड़ी के निर्माण की बात करें तो एक डिब्बे में चार्जिंग बैटरी और लाइट को फिट किया गया है। हवा से डिब्बा आसानी से घूम सके इसके लिए पंखे की बेरिंग का उपयोग किया गया हे और डिब्बे के पंख भी रखे गए हैं। रात को डिब्बे में राखी लाइट चालू की जाती है। डिब्बे की रचना ऐसी है कि यह सामान्य हवा के साथ भी घूमता है। इसलिए, बैटरी का प्रकाश फॉक्स भी पूरे क्षेत्र में चलता है। इस तरह से खेतमे रातभर फॉक्स होने की वजह से रोज़, सूअर जैसे जानवरो आते नहीं है। हरिभाई का कहना है कि इस तरह के देसी दीवाडांड़ी बनाने की लागत केवल 500 रुपये है। रोज़, सूअर जैसे जानवरों के कारण खेती को भारी नुकसान हो रहा है। इस वजह से किसानों को रातभर जागना पड़ता है। ऐसे जानवरों से रक्षा करने के लिए, किसान हजारों-लाखो रुपये की कीमत पर तार फेन्सिंग लगाते हैं। इस स्थिति में, हरिभाई की कोठासुज की कमाल से बनाई दीवाड़ाडी किसानों के लिए उपयोगी हो सकती हैं। इसके बारे में अधिक जानकारी के लिए हरिभाई थुमर के नंबर 9428240817 पर संपर्क कर सकते हैं।

असिस्टेंड प्रोफेसर की नौकरी छोड़ यह लड़की बनी किसान, खेती करके कमा रही है लाखों का मुनाफा

छत्तीसगढ़ के रायपुर से करीब 88 किलोमीटर दूर मुहसमूंद के बागबाहरा में रहनेवाली 27 वर्षीय वल्लरी चंद्राकर ने कंप्यूटर साइंस से एमटेक की पढ़ाई की है। वल्लरी ने अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई साल 2012 में पूरी कर बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर अपने करियर की शुरूआत की। एक दिन छुट्टियों में जब वहअपने गांव आईं तो उसने देखा कि लोग आज भी पुराने तरीके से ही खेती कर रहे हैं जिससे उन्हें बहुत कम मुनाफा मिल रहा है. वल्लरी ने साल 2016 में अपनी नौकरी छोड़कर खेती को अपना पेशा बना लिया। उसने करीब 15 एकड़ जमीन से खेती की शुरूआत की और उस जमीन पर सब्जियां उगाना शुरू किया। वल्लरी अपने गांव में टमाटर, सेम, खीरा, करेला, लौकी, मिर्च, बींस और शिमला मिर्च की खेती कर रही हैं. उनके खेतों में उगाई गई सब्जियां दिल्ली, भोपाल, इंदौर, उड़िसा, नागपुर और बैंगलुरु जैसे कई शहरों तक पहुंचाई जाती है। वल्लरी अपनी सब्जियों को दुबई और इजराइल तक एक्पोर्ट करने की तैयारी भी कर रही हैं। वल्लरी की टीम में शामिल 7 इंजीनियरिंग और मार्केटिंग क्षेत्रों के युवाओं ने उनके आइडिया को साकार रुप देने में अपना काफी योगदान दिया है। सब्जियों की खेती करके वल्लरी ना सिर्फ हर महीने लाखों की कमाई कर रही हैं बल्कि गांव के दूसरे लोगों को रोजगार भी प्रदान कर रही हैं। वल्लरी की इस तरक्की को देखकर उनके गांवं के आस-पास के दूसरे किसान भी उनसे खासा प्रभावित हो रहे हैं। बहरहाल खेती के लिए जब वल्लरी ने अपनी अच्छी खासी नौकरी छोड़ दी थी तब उन्हें लोगों ने पढ़ी-लिखी बेवकूफ कहा था लेकिन वल्लरी ने खेती करके लोगों के सामने यह मिसाल कायम की है कि एक लड़की भी खेती करके लाखों का मुनाफा कमा सकती है।

मिलिए खेती के 'मास्टर' से, जो ऑनलाइन कृषि मार्केटिंग से कमाते है लाखों रूपये

मिलिए खेती के 'मास्टर' से, जो ऑनलाइन कृषि मार्केटिंग से कमाते है लाखों रूपये उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से स्नातक की पढ़ाई कर रोजगार की तलाश न कर सोमवर्धन पांडेय ने वापस अपने गांव लौटकर खेती में कुछ ऐसा प्रयोग किया की जापान, थाईलैंड सहित अन्य देशों के कृषि विशेषज्ञों ने उनके गांव का दौरा ही नहीं किया बल्कि उनको मास्टर का दर्जा तक दे डाला। आज अपने गांव से ही इस तकनीक के माध्यम से देश ही नहीं दुनिया में अपने नाम के साथ देश में नाम रौशन कर रहे हैं। साथ-साथ ऑनलाइन मार्केटिंग के जरिये अपने प्रयोग को बाजार में बेच कर 25 लाख रुपये सालाना तक का कारोबार कर रहे हैं। वो खुद आर्थिक रूप से तो मजबूत हो ही रहे हैं, बेरोजगारों के लिए रहनुमा भी साबित हो रहे हैं। उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में स्थित मिहीपुरवा ब्लॉक में 4 हज़ार की आबादी वाला गांव कुड़वा है जहां सोमवर्धन पांडेय अपने परिवार के साथ रहते हैं।1999 में लखनऊ विश्विद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त करके नौकरी के पीछे न भागकर कृषि को अपना जीविकोपार्जन का साधन बनाने की ठानी। सोमवर्धन पांडेय ने कहा कि उद्यान विभाग के उद्यान निरीक्षक आरके वर्मा की मदद से 2004-05 में 10 हजार की लागत से 3 बीघे में ग्लैडियोलस की खेती की शुरुआत की, जिसके फूल बहराइच, लखनऊ व प्रदेश के अन्य शहरों में बिकने के लिए भेजे गए । उन्होंने बताया कि इससे मुझे 8 से 10 लाख रुपये की आय हुई थी। जिसकी वजह से मेरा औद्यानिक फसलों और कृषि क्षेत्र में नये-नये प्रयोग करते हुये फूलों की खेती की तरफ रुझान बढ़ा। हमने कृषि में नवीनतम तकनीक को अपनाते हुए फूलों की खेती को मानक बनाया। फूलों की खेती में मैं न सिर्फ मण्डी पर आधारित रहा बल्कि गोण्डा, बलरापुर, बहराइच, लखीमपुर, सीतापुर यहां के फुटकर फूल विक्रेताओं से भी सम्पर्क साधा। यही मेरी सफलता का मूल कारण बना। जिसकी वजह से प्रदेश के फूल उत्पादक कृषकों में मेरा अपना एक स्थान है। सोमवर्धन पांडेय आगे कहते हैं कि कुछ नया करने का जुनून खत्म नहीं हुआ और जापान की एक प्राचीन कला जिसको बोनसाई कहते हैं, उसके ऊपर रिसर्च करना शुरू किया। लगभग साल भर तक उसकी तकनीक पर गहराई से अध्यन करने के बाद उस पर काम करना प्रारम्भ किया. बोन का मतलब प्लेट और साई का मतलब पौधा रिसर्च में निकल कर आया। बड़े वृक्ष को छोटे रूप में प्लेट में ले आते हैं। इस तकनीक के हिसाब से एक पौधे में 8 साल तक का वक्तम लगता है। उन्होंने दवा किया की हमारे पास 40 साल पुराना पेड़ है जिसको हमने छोटा रूप देकर तैयार किया है। देश विदेश से इसकी लगातार डिमांड आ रही है। 5 लाख से अधिक तक देने को लोग तैयार हैं लेकिन हमने बेचा नहीं। वैसे अमूमन पौधे के 5 हज़ार से 12 हज़ार तक मिल जाते हैं। उनका का कहना था कि फूलों के बीज को कोल्ड स्टोरेज में रखना पड़ता है ताकि उसको अगले साल भी इस्तेमाल किया जा सके। आर्थिक हालत पर कहते हैं कि तीन भाइयों के सहयोग से हम 25 बीघे में इसकी खेती कर रहे हैं जिससे मेरा सालाना कारोबार 25 लाख रुपये का है। सोमवर्धन पांडेय सन्देश देते हुये कहते हैं कि शहरों में जिस तेज़ी के साथ आबादी से ऑक्सीजन की कमी हो रही है, अगर बोनसाई को शहरों में किसान पहुंचायेगा तो एक तरफ किसान की आर्थिक स्थिति अच्छी होगी और शहरों में ऑक्सीजन और सकरात्मक ऊर्जा बढ़ जाएगी किसान के जेब में पैसा होगा और शहरों में ऑक्सीजन। यही वजह है कि हमने अपने घर को बोन्साई से ऐसा मेंटेन किया है कि जिसको हरियाली कि जन्नत कहा जाता है। उन्होंने शहरों में बिमारियों को रोकने के लिए घरों में एरिका पाम, मनी प्लांट के साथ में इसनेक प्लांट, टंग प्लांट लगाने पर बल दिया और दवा किया किया कि जहां घर में इससे एक ओर ऊर्जा मिलेगी साथ में घर में 90 प्रतिशत बीमारी अपने आप खत्म हो जाएगी. उन्होंने आगे कहा कि अभी एक नई तकनीक बोगन बेलिया पर नया प्रयोग जारी है। साथ-साथ नीबू की सघन बागवानी, विभिन्न प्रकार के पौधों के बोनसाई तैयार करना व गेंदा, गुलाब, ग्लैडियोलस व सीजनल फूलों की खेती की जा रही है। उन्होंने कहा कि दुनिया मुझे एक बोनसाई मास्टर के रूप में जानती है और मेरी बोनसाई भारत के साथ-साथ दुनिया के हर कोने में ऑन-लाइन मार्केटिंग द्वारा जा रही है। और ऑन-लाइन मार्केटिंग प्रक्रिया के लिए कोई बड़ा स्टाफ नहीं रखा बल्कि खुद अपने घर से संचालित करता हूं। वर्तमान में मेरे द्वारा भोजपत्र, बरगद, पीपल, पाकड़, नीम, गुलर, बोगन बेलिया, फाइकस, पाम, जेड प्लान्ट (गुडलक प्लान्ट) जापानी पौधा आदि के पौधे बोनसाई तैयार किये जा रहें है। प्रति वर्ष मेरे द्वारा 8-10 लाख रुपये के बोनसाई तैयार कर बिक्रय किये जा रहे हैं। शिक्षित बेरोजगार उद्यान विभाग से नर्सरी उत्पादन का प्रषिक्षण प्राप्त कर इसको एक कुटिर उद्योग के रूप में अपना सकते हैं। बहराइच उद्यान विभाग के उद्यान निरीक्षक आरके वर्मा ने बताया कि सोमवर्धन पांडेय ने देश का नाम पूरी दुनिया में रौशन किया है आज उनकी कामयाबी और लगन को देखते हुए नौजवान कृषि के क्षेत्र कि तरफ लौट रहे हैं। उनका मानना है कि आज के भौतिक युग में लोगों के घरों में जगह काफी कम हो गयी है। इसलिये वे हमारे भारतीय संस्कृति के पौधे बोनसाई के रूप में लगाकर हरियाली का आनन्द लेने के साथ ही शहरों में प्रदूषित वातावरण में कम स्थान में हम अपनी पवित्र वनस्पति को जीवित रख सकते हैं और पूरे शहर के वातावरण स्वच्छ एवं ऑक्सीजन युक्त कर सकतें हैं। कहानी उस युवा किसान की जिसने नौकरी छोड़ खेती में बनाया करियर यह कहानी है सलेमपुर के समीप गोविन्दपुरा गांव के हंसपाल मीना की। 26 वर्षीय युवा किसान हंसपाल अब पशुपालन डेयरी के साथ खेती कर अच्छा मुनाफा कमा रहा है। स्नातक करने के बाद उसने बैंक की नौकरी के लिए तीन बार प्रयास किया, लेकिन साक्षात्कार में सफल नहीं हो सका। इसके बाद जयपुर में लो फ्लोर रोडवेज बस में परिचालक की नौकरी की, लेकिन रास नहीं आई और महज एक सप्ताह में छोड़कर गांव लौट आया और परिजनों को खेती करने की इच्छा जताई। मन में कृषक बन कुछ अलग करने की ठानी तो घर वालों का सहयोग नहीं मिला, जैसे-तैसे घर वालों को राजी भी किया तो फिर किस्मत ने साथ नहीं दिया और पहले ही प्रयास में लाखों का नुकसान झेलना पड़ गया, लेकिन उसने अपनी जिद के आगे हार नहीं मानी और शायद यही वजह रही कि अब वह एक सफल युवा किसान बनकर उभरा है। पहले प्रयास में ताईवान रेडलेडी पपीता लगाया, लेकिन प्रकृति की पड़ी मार (ओलावृष्टि) ने करीब डेढ़ लाख रुपए के घाटा दे दिया। लेकिन वह हताश नहीं हुआ और करीब तीन वर्ष पहले रसभरी फल की खेती शुरू की तो अच्छा मुनाफा भी कमाया। हंसपाल के अनुसार करीब तीन वर्ष पहले इंटरनेट पर ढूंढते-ढूंढते रसभरी की खेती रास आ गई। वर्ष 2015 में अपने खेत में से करीब 2 बीघा भूमि में रसभरी फल का बीज बो दिया, जो पहले ही वर्ष फायदे का सौदा साबित हुआ। दूसरे वर्ष दोनों भाईयों ने उसे बढ़ाते हुए तीन बीघा में बोया तो फिर अच्छी उपज और दाम मिले। इस वर्ष फिर फसल का रकबा बढ़ा दिया। वर्तमान में करीब चार बीघा भूमि में रसभरी फल की खेती लहलहा रही है। इसी के साथ हंसपाल ने पशुपालन कर डेयरी खोली। करीब दो दर्जन होल्सटीन फ्रीसिएन नस्ल की गाय और चार भैंसों के साथ डेयरी का संचालन कर रहे हंसपाल के अनुसार वर्तमान में करीब डेढ़ क्विंटल दूध की वह आपूर्ति कर रहा है। हंसपाल के अनुसार वह गंगापुर स्थित दुग्ध डेयरी, विद्यालयों में दूध की आपूर्ति की जा रही है। अब हंसपाल की ग्रीनहाउस का सपना संजोकर उसमें नई तकनीक से फल-सब्जी की पैदावार करना है।

कहानी उस युवा किसान की जिसने नौकरी छोड़ खेती में बनाया करियर

कहानी उस युवा किसान की जिसने नौकरी छोड़ खेती में बनाया करियर यह कहानी है सलेमपुर के समीप गोविन्दपुरा गांव के हंसपाल मीना की। 26 वर्षीय युवा किसान हंसपाल अब पशुपालन डेयरी के साथ खेती कर अच्छा मुनाफा कमा रहा है। स्नातक करने के बाद उसने बैंक की नौकरी के लिए तीन बार प्रयास किया, लेकिन साक्षात्कार में सफल नहीं हो सका। इसके बाद जयपुर में लो फ्लोर रोडवेज बस में परिचालक की नौकरी की, लेकिन रास नहीं आई और महज एक सप्ताह में छोड़कर गांव लौट आया और परिजनों को खेती करने की इच्छा जताई। मन में कृषक बन कुछ अलग करने की ठानी तो घर वालों का सहयोग नहीं मिला, जैसे-तैसे घर वालों को राजी भी किया तो फिर किस्मत ने साथ नहीं दिया और पहले ही प्रयास में लाखों का नुकसान झेलना पड़ गया, लेकिन उसने अपनी जिद के आगे हार नहीं मानी और शायद यही वजह रही कि अब वह एक सफल युवा किसान बनकर उभरा है। पहले प्रयास में ताईवान रेडलेडी पपीता लगाया, लेकिन प्रकृति की पड़ी मार (ओलावृष्टि) ने करीब डेढ़ लाख रुपए के घाटा दे दिया। लेकिन वह हताश नहीं हुआ और करीब तीन वर्ष पहले रसभरी फल की खेती शुरू की तो अच्छा मुनाफा भी कमाया। हंसपाल के अनुसार करीब तीन वर्ष पहले इंटरनेट पर ढूंढते-ढूंढते रसभरी की खेती रास आ गई। वर्ष 2015 में अपने खेत में से करीब 2 बीघा भूमि में रसभरी फल का बीज बो दिया, जो पहले ही वर्ष फायदे का सौदा साबित हुआ। दूसरे वर्ष दोनों भाईयों ने उसे बढ़ाते हुए तीन बीघा में बोया तो फिर अच्छी उपज और दाम मिले। इस वर्ष फिर फसल का रकबा बढ़ा दिया। वर्तमान में करीब चार बीघा भूमि में रसभरी फल की खेती लहलहा रही है। इसी के साथ हंसपाल ने पशुपालन कर डेयरी खोली। करीब दो दर्जन होल्सटीन फ्रीसिएन नस्ल की गाय और चार भैंसों के साथ डेयरी का संचालन कर रहे हंसपाल के अनुसार वर्तमान में करीब डेढ़ क्विंटल दूध की वह आपूर्ति कर रहा है। हंसपाल के अनुसार वह गंगापुर स्थित दुग्ध डेयरी, विद्यालयों में दूध की आपूर्ति की जा रही है। अब हंसपाल की ग्रीनहाउस का सपना संजोकर उसमें नई तकनीक से फल-सब्जी की पैदावार करना है।

प्रगतीशील महिला किसान ललिता को मोदी करेंगे सम्मानित

प्रगतीशील महिला किसान ललिता को मोदी करेंगे सम्मानित मध्यप्रदेश की महिला किसान ललिता मुकाती ने 36 एकड़ में जैविक पद्धति से चीकू, सीताफल और कपास का रिकार्ड उत्पादन कर दिखाया। यदि सब कुछ ठीक रहा तो जल्द ही वह इन जैविक फलों की निर्यातक भी बन जाएंगी।यही नहीं वे गांव की महिलाओं का समूह बनाकर उन्हें भी जैविक खेती के लिए प्रोत्साहित कर रही है। केंद्र सरकार ने उन्हें देश की उन 114 महिला किसानों में शामिल किया है, जिन्होंने भारतीय कृषि में बेहतरीन योगदान दिया है। इन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सम्मानित करेंगे। हालांकि अभी तारीख तय नहीं है। कुछ साल पहले तक 50 वर्षीय ललिता सुरेंशचंद्र सामान्य किसान परिवार में एक बहू, मां और पत्नी की जिम्मेदारी बखूबी निभा रही थीं। एमएससी एग्रीकल्चर की डिग्री लेकर पति ने उन्नत खेती शुरू की। उनकी इस पहल को वे करीब से देखती समझती रहीं। बैंकर और डॉक्टर बेटियों के करियर में व्यस्त होने के बाद 10 साल पहले उन्होंने खेती संभाली। वहीं से यह सफर शुरू हुआ। ललिता ने बताया कि उनके परिवार की करीब 100 एकड़ जमीन है। कृषि कार्य में पति का हाथ बंटाने को घर से खेतों तक पहुंचने के लिए उन्होंने पहले स्कूटी चलाना सीखी और धीरे-धीरे खेती के उपकरण भी। ट्रैक्टर चलाना भी सीखा। रासायनिक खादों के दुष्प्रभावों को देखते हुए तीन वर्ष पूर्व जैविक खेती करने का मन बनाया। इसके लिए 36 एकड़ जमीन में से 25 एकड़ में सीताफल, छह में चीकू और पांच एकड़ में कपास की फसल लगाई। वर्मी कम्पोस्ट, गौ मूत्र, छांछ, वेस्ट डी-कम्पोसर आदि का उपयोग किया। साथ ही खेत और घर में गोबर गैस प्लांट व सोलर पंप भी लगाए। मप्र शासन की योजना के तहत मुकाती दंपती ने जर्मनी और इटली जाकर वहां की जाने वाली आधुनिक व उन्न्त खेती की तकनीक भी सीखी। साथ ही जिले के कृषि विज्ञान केंद्र व देश में कई स्थानों पर जैविक खेती की कार्यशालाओं व प्रशिक्षण में भाग लिया। दो वर्ष पूर्व 36 एकड़ जैविक खेती वाले हिस्से का पंजीयन मप्र जैविक प्रमाणीकरण बोर्ड में भी कराया। सुरेशचंद्र मुकाती ने बताया कि पंजीयन पश्चात प्रतिवर्ष बोर्ड द्वारा खेत का सूक्ष्म निरीक्षण किया जा रहा है। अगले वर्ष निरीक्षण पश्चात जैविक खेती का प्रमाणित होने पर जैविक खेती के उत्पाद विदेशों को निर्यात कर सकेंगे। वर्तमान में जैविक सीताफल व चीकू महाराष्ट्र, गुजरात सहित दिल्ली तक बेच रहे हैं। इनका भाव सामान्य फलों की तुलना में लगभग डेढ गुना मिलता है। विकास जंगरा और विवेक पराशर ने बताया कि दिल्ली में जल्द ही होने वाले रियलिटी शो और अवॉर्ड के आयोजन की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। आयोजन में 114 कृषक महिलाओं में से चयनित तीन महिलाओं को विशेष पुरस्कार भी दिए जाएंगे।

'पद्मश्री' से सम्मानित हुए जगदीश पारीक, जैविक खेती में लहराया परचम

'पद्मश्री' से सम्मानित हुए जगदीश पारीक, जैविक खेती में लहराया परचम सीकर जिले के अजीतगढ़ के धरतीपुत्र जगदीश पारीक को पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा गया है. जगदीश पारीक को पदमश्री का पुरस्कार उनके जैविक खेती में किए जाने वाले नवाचारों के लिए नवाजा गया है. जगदीश पारीक मूल रूप से अजीतगढ़ कस्बे के रहने वाले हैं. 71 वषीय जगदीश सब्जियों की नई किस्म तैयार कर किसानों को मुहैया कराते रहे हैं साथ ही जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए नवाचार करते रहते हैं.आज के दौर में सभी जगह कीटनाशकों का बोलबाला है तथा खान-पान की चीजें भी इससे अछूती नहीं रह पाई हैं. बाजार में बिना कीटनाशकों का प्रयोग किए कोई खाद्य सामग्री सुगमता से उपलब्ध नहीं है और अगर कहीं उपलब्ध भी है तो उसकी कीमत इतनी अधिक है कि वह आमजन की पहुंच से कोसों दूर है. लोगों की इसी परेशानी को देखते हुए श्रीमाधोपुर उपखंड के अजीतगढ़ निवासी जगदीश प्रसाद पारीक ने जैविक खेती की ओर रुख किया. जगदीश पारीक एक किसान हैं परन्तु खेती में नए-नए प्रयोग करके इन्होंने किसान वैज्ञानिक का दर्जा प्राप्त कर लिया है. नियमित नवाचार तथा कीटनाशक मुक्त खेती की वजह से इन्होंने अपना तथा अपने क्षेत्र का नाम देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी रोशन किया है. जगदीश पारीक निरंतर सब्जियों की नई किस्म विकसित करने में लगे रहते हैं. जैविक खेती के जरिए अच्छी गुणवत्ता, कीटरोधी तथा सामान्य से काफी बड़े आकार की सब्जियां पैदा करके इन्होंने आधुनिक समय में व्याप्त उस मिथ्या भ्रान्ति को तोड़ा है जिसमे यह माना जाता है कि आज के समय में बिना कीटनाशकों के प्रयोग के अधिक तथा गुणवत्तापूर्ण सब्जियां नहीं उगाई जा सकती हैं. पारीक ने आर्गेनिक खेती की शुरुआत वर्ष 1970 से करना शुरू की. सबसे पहले उन्होंने गोभी की पैदावार से शुरुआत की. शुरू-शुरू में इनकी पैदा की गोभी का वजन लगभग आधा किलो से पौन किलो तक होता था. रासायनिक खाद या कीटनाशकों का प्रयोग नहीं किया बल्कि सिर्फ गोबर से बनी हुई जैविक खाद का प्रयोग किया. पारीक के खेत में 15 किलो वजनी गोभी का फूल, 12 किलो वजनी पत्ता गोभी, 86 किलो वजनी कद्दू, 6 फुट लंबी घीया, 7 फुट लंबी तोरई, 1 मीटर लंबा तथा 2 इंच मोटा बैंगन, 3 किलो से 5 किलो तक गोल बैंगन, 250 ग्राम का प्याज, साढ़े तीन फीट लंबी गाजर और एक पेड़ से 150 मिर्ची तक का उत्पादन हो चुका है. सबसे अधिक किस्में फूलगोभी में है तथा इन्होंने अभी तक 8 किलो से लेकर 25 किलो 150 ग्राम तक की फूलगोभी का उत्पादन कर लिया है. अपने निरंतर प्रयोग तथा कार्यों के प्रोत्साहन स्वरुप इन्हें वर्ष 2000 में श्रृष्टि सम्मान तथा वर्ष 2001 में फर्स्ट नेशनल ग्रास रूट इनोवेशन अवॉर्ड मिल चुका है. वर्ष 2001 में ही 11 किलो की गोभी उत्पादन के लिए इनका नाम लिम्का बुक में दर्ज हो चुका है. पारीक अब तक छह बार राष्ट्रपति भवन के कार्यक्रमों में शिरकत कर चुके हैं तथा सबसे वजनी गोभी के फूल के विश्व रिकॉर्ड में दूसरे पायदान पर हैं. जगदीश प्रसाद विश्व रिकॉर्ड को तोडऩे के लिए जैविक खेती से 25 किलो 150 ग्राम वजनी गोभी का एक फूल उत्पादित कर चुके हैं परन्तु इनकी गोभी का फूल साढ़े आठ सौ ग्राम वजन से पिछड़ा हुआ है. वर्तमान में गोभी के फूल का विश्व रिकॉर्ड 26 किलो वजन के साथ अमेरिका के नाम है.जगदीश पारिक की इन उपलब्धियों को लेकर उन्हें इस बार भारत सरकार ने पद्मश्री सम्मान से सम्मानित करने का फैसला किया है.

जैविक खेती - हुकुमचंद पाटीदार की सफलता की कहानी | खेत से विदेशी रसोई तक

जैविक खेती - हुकुमचंद पाटीदार की सफलता की कहानी | खेत से विदेशी रसोई तक भारत में जैविक खेती प्रणाली नई नहीं है। प्राचीन काल में भी इसका पालन किया गया है। हुकुमचंद पाटीदार की सफलता की कहानी सत्यमेव जयते शो में दिखाई दी है। उसके जैविक खेत का प्रसार 40 एकड़ है। झलवाड़ के मनपुरा गांव के निवासी, वह स्वामी विवेकानंद कृषि अनुसंधान के संस्थापक हैं। हुकुमचंद पाटीदार का नाम एक आम आदमी के दिमाग में नहीं हो सकता है लेकिन वह जैविक खेती के क्षेत्र में दुनिया भर में काफी प्रसिद्ध है। पाटीदार के खेत पर नियमित रूप से कार्बनिक खेती की जा रही है। विभिन्न फसलों के साथ प्रयोग किए जा रहे हैं। उनका खेत दुनिया के 7 देशों को जैविक उत्पाद प्रदान करता है। वह कृषि के क्षेत्र में विभिन्न पुरस्कार प्राप्तकर्ता हैं। हुकुमचंद पाटीदार ने वर्ष 2004 में कार्बनिक खेती शुरू की। शुरुआत में उन्होंने 4 एकड़ जमीन पर जैविक फसलों की वृद्धि की। गेहूं की फसल को पहले वर्ष में 40 प्रतिशत की गिरावट आई थी लेकिन वह निर्धारित किया गया था कि किसी भी रासायनिक उर्वरक और स्प्रे का उपयोग न करें। बैंक से ऋण लेते हुए उन्होंने वर्मी-कंपोस्ट तैयार किया और अपनी फसलों पर इसका इस्तेमाल किया। इसके परिणामस्वरूप अच्छी फसल हुई और उसके नुकसान की भरपाई हो गई। उसके बाद उन्होंने 40 एकड़ भूमि पर जैविक खेती शुरू की। हालांकि उन्हें कम उत्पादन, कोई मार्गदर्शन, विकल्पों की उपलब्धता की कमी जैसी कई समस्याओं का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। तब से वह अपनी फसल के लिए वर्मी-कंपोस्ट का उपयोग लगातार बढ़ रहा है। Farm to Kitchen.com उनकी वेबसाइट है जिसके माध्यम से वह मध्यप्रदेश, राजस्थान, पंजाब और गुजरात में अपनी फसलों का विपणन करता है। गेहूं, जौ, ग्राम, मेथी, धनिया, लहसुन आदि भी उनके खेत में उगाए जाते हैं। भारत के अलावा, ऑस्ट्रेलिया, जापान, न्यूजीलैंड, जर्मनी, फ्रांस और कोरिया जैसे विदेशी देशों में उनकी उपज की मांग भी है। कार्बनिक खेती सीखने के लिए इन देशों के छात्र उनके खेत में आते हैं।

हर साल 10 लाख रुपये, एक हेक्टेयर (हेक्टेयर) भूमि से - एक अविश्वसनीय प्रस्ताव

उन सभी लोगों के लिए जो बहुत प्रचारित विचार पर खरीदे गए हैं कि छोटे खेत लाभहीन हैं। लेकिन रमेश चंदर डागर ने इस प्रस्ताव को वास्तविक बनाया है। हरियाणा के सोनीपत जिले के अकबरपुर बरोटा गांव में उनकी खेत की मुलाक़ात काफी आंख खोलने वाली हो सकती है। खेत की भूमि किसी भी कृषि वैज्ञानिक की प्रयोगशाला जैसा दिखता है। डागर कहते हैं, "मैं एक साधारण किसान हूं, जिसने केवल 10 वें मानक तक अध्ययन किया है। मैं सरकार के सुनवाई दावों को सुनता था कि छोटे भूमि अधिग्रहण कृषि के लिए व्यवहार्य नहीं हैं और इससे में सोचने लगा। लगभग चार साल पहले, मैंने अपनी कृषि भूमि से एक हेक्टेयर को अलग कर दिया और इस पर प्रयोग करना शुरू कर दिया। आज मुझे पूरा भरोसा है कि यह भूमि सालाना 10 लाख रुपये की न्यूनतम आय दे सकती है।" डागर एकीकृत कार्बनिक खेती का पालन करता है। डागर कहते हैं "इस तरह की खेती का मतलब केवल कीटनाशकों का उपयोग नहीं करना नहीं है लेकिन इसमें मधुमक्खी पालन, डेयरी प्रबंधन, बायोगैस उत्पादन, जल संचयन और कंपोस्टिंग जैसे कई अन्य प्रथाएं भी शामिल हैं। इन सभी प्रथाओं का एक अच्छा संयोजन जैविक खेती को पारिस्थितिकीय और वित्तीय रूप से सफल बनाना सुनिश्चित करता है।" आज वह अपने राज्य में एकीकृत जैविक खेती के संदेश को फैलाने में व्यस्त है। अन्य किसानों के समर्थन के साथ, उन्होंने हरियाणा किसान कल्याण क्लब की स्थापना की है, जिसकी राज्य के सभी जिलों में शाखाएं हैं। करीब 5,000 किसान इस क्लब के सक्रिय सदस्य हैं और वे तेजी से दुनिया भर में फैल रहे हैं। राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों में अब जैविक खेती क्लबों की नकल करने के प्रयास हो रहे है। 1971 में डागर ने सीखकर केवल 1.6 हेक्टेयर भूमि के साथ खेती शुरू की; आज वह करीब 44 हेक्टेयर है, जो सभी एकीकृत जैविक खेती के तहत पूरी तरह से है। तीन कारकों की स्पष्ट समझ - बाजार की मांग, उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों और उत्पाद की गुणवत्ता को बनाए रखने - उन्हें सफल होने में मदद मिली। अधिकांश जैविक किसानों को अपने उपज के लिए अच्छे बाजार मिलना मुश्किल लगता है, लेकिन दगर को नहीं। डागर कहते हे "एक नई फसल बोने से पहले, मैं पहले बाजार सर्वेक्षण करता हूं और मांग को समझता हूं। यह केवल तभी होता है जब मैं 60 फीसदी रिटर्न मिलने के बारे में सुनिश्चित करता हूं, और 40 फीसदी जोखिम उठाता हु।" और ज्यादातर मामलों में यह अपने अच्छे काम करता है। डागर के खेत में लगभग सभी मौसमी सब्जियां, फल, धान, गेहूं, मशरूम और फूल व्यवस्थित रूप से उगाए जाते हैं। उन्होंने निर्यात के लिए लेटस, बेबी मकई और स्ट्रॉबेरी जैसे विदेशी सब्जियों और फलों को भी बढ़ाना शुरू कर दिया है। इस अभिनव किसान ने अनुसंधान उद्देश्यों (डागर की शोध प्रयोगशाला) के लिए एक हेक्टेयर को अलग कर दिया है। "इस भूमि के माध्यम से, मैं उन सभी को गलत साबित करना चाहता हूं जो जैविक खेती की लाभप्रदता पर शक करते हैं। कुछ कड़ी मेहनत और प्रकृति की समझ के साथ, कोई किसान कम से कम 10 लाख रुपये कमा सकता है। मुझे समझ में नहीं आता कि हर कोई क्यों नौकरी के बाद चल रहा है? " वह पूछता है। डागर की शोध प्रयोगशाला एक असाधारण दृश्य है। कोई एक छोर पर खाद हो रहा है, दूसरे छोर पर फूल उगता है, मछलियों के साथ एक खेत तालाब, और एक बायोगैस संयंत्र। और उनके खेत में ये सभी तत्व विभिन्न कृषि प्रक्रियाओं के माध्यम से जुड़े हुए हैं और एक साथ 13-14 लाख रुपये की वार्षिक आय उत्पन्न करते हैं। इसके अलावा, खेत सौर ऊर्जा का उपयोग करके कीमती ऊर्जा बचाता है। "लगभग सभी भारतीय किसान धान की फसल के बाकी हिस्सों को जलाते हैं, जिन्हें स्थानीय रूप से पावल कहा जाता है। असल में यह वर्मीकंपोस्ट (गांडुमाओं का उपयोग करके खाद) के लिए एक उत्कृष्ट कच्ची सामग्री है। इसके उपयोग के माध्यम से, मैं सालाना 300 टन वर्मीकंपोस्ट का उत्पादन करता हूं," डागर कहते हैं। "इसका एक हिस्सा का खेतों में उपयोग किया जाता है और शेष 3 रुपये प्रति किलो (किलोग्राम) की दर से बेचा जाता है। डागर का दावा है कि वर्मीकंपोस्ट सबसे अच्छा मिट्टी-पोषक तत्व है न केवल मिट्टी को नमी बनाए रखने में मदद करता है बल्कि पानी की खपत लगभग 25 प्रतिशत कम कर देता है। वह किसानों को 2 किलोग्राम गांडुड़ियों को मुफ्त में प्रदान करता है, जो जैविक खेती करने का वचन देते हैं, वह मशरूम विकसित करने के लिए भी पावल का उपयोग करता है, जो उन्हें प्रति वर्ष 3 लाख रुपये तक देता है। डागर वर्मीकंपोस्ट के अलावा सामान्य खाद भी पैदा करता है,उसके खेत से खाद की कुल वार्षिक पीढ़ी लगभग 600 टन है। डागर का लक्ष्य इस साल के अंत तक 1,000 टन तक बढ़ाना है। खेत में एक और agrocycle डेयरी, बायोगैस और खाद है। डागर के डेयरी में लगभग 50 भैंस हैं। उनके गोबर (खाद) का उपयोग 85 घन मीटर क्षमता बायोगैस संयंत्र में किया जाता है। संयंत्र की स्थापना के लिए उन्हें 1 लाख रुपये खर्च हुए। गैस को अपनी निजी रसोई में प्रयोग किया जाता है, और चारा-काटने की मशीन चलाने के लिए भी प्रयोग किया जाता है। पौधे से 'अपशिष्ट' कंपोस्टिंग पिट्स में जाता है। डागर का खेत तालाब अभी एक और अभिनव चक्र है। अधिकतर किसान ऐसे तालाब से बचने से बचते हैं क्योंकि इससे बहुमूल्य कृषि भूमि का उपयोग होता है। उनके खेत के तालाब वर्षा जल एकत्र करते हैं, जिसका उपयोग डेयरी में भैंस धोने के लिए किया जाता है। जैविक किसान बताते हैं, "मैंने तालाब में मछली भी पेश की है, जो मुझे प्रति वर्ष 30,000 रुपये लाती है। इसलिए, मैं न केवल भूजल रिचार्ज कर रहा हूं, बल्कि इससे पैसा भी कमा रहा हूं।" डागर के खेत अभ्यास का सबसे महत्वपूर्ण तत्व मधुमक्खी पालन करना है; यह 10-30 प्रतिशत तक अपने फसल उत्पादन में वृद्धि करता है (मधुमक्खी प्राकृतिक परागण में बहुत प्रभावी हैं)। इसके अलावा शहद के उत्पादन की बहुत मांग है। डागर के पास लगभग 150 मधुमक्खी बक्से हैं; प्रत्येक 35-40 किलो शहद उत्पन्न करता है। शहद से उनकी कुल वार्षिक आय 4 लाख रुपये है। डागर कहते हैं, "मधुमक्खी पालन करना एक बहुत ही लाभदायक व्यवसाय है जिसे एक भूमिहीन किसान भी किया जा सकता है। और एक किसान लगभग 2-3 किमी के क्षेत्र को लाभ पहुंचा सकता है।" डागर ने 4 लाख रुपये की कुल लागत पर सौर पैनल भी स्थापित किए हैं; उन्होंने 67,000 रुपये खर्च किए और शेष सरकारी सब्सिडी से आए। अपने खेत में, पंप चलाने के लिए सौर ऊर्जा का उपयोग किया जाता है जो सिंचाई के लिए भूजल खींचता है। अतिरिक्त इन्वर्टर की बैटरी रिचार्ज करने के लिए अधिशेष शक्ति का उपयोग किया जाता है। खेत की भूमि में 500 वर्ग मीटर के क्षेत्र में एक ग्रीन हाउस फैला हुआ है, जिसका उपयोग महंगा फसलों को बढ़ाने के लिए किया जाता है जो उन्हें प्रति वर्ष 1 लाख रुपये लाते हैं। आज डागर पूरे देश में एकीकृत खेती को फैलाने में व्यस्त है। हरियाणा के किसान मिशन में मुख्य भूमिका निभा रहे हैं। हरियाणा किसान कल्याण क्लब जैविक खेती पर प्रशिक्षण देता है। चूंकि अधिकांश किसान जिला क्लब नहीं आ सकते हैं, इसलिए गांव के स्तर पर कार्यशालाएं आयोजित की जाती हैं। इस साल फरवरी में सोनीपत में लगभग 4,000 किसानों की एक सभा आयोजित की गई थी। किसानों के अलावा, विशेषज्ञों, कृषि वैज्ञानिकों और नौकरशाहों को आमंत्रित किया गया था। लेकिन डागर ने स्वीकार किया कि जैविक खेती को एकीकृत करने की दिशा में सरकारी मशीनरी को प्रेरित करना एक बड़ा काम है। लेकिन डागर सरकारी मदद की प्रतीक्षा नहीं कर रहे हैं। उन्होंने जैविक खेती को अपना मिशन बनाया है। "मैं अपने क्षेत्र में विभिन्न फसलों के साथ प्रयोग करता रहता हूं। उदाहरण के लिए, अभी मैं एक चीनी पौधा विकसित करने की कोशिश कर रहा हूं, जो चीनी से 300 गुना मीठा है लेकिन कोलेस्ट्रॉल मुक्त है। अगर मैं मेरा उद्यम में सफल रहूँगा, मैं दूसरों को इसकी सिफारिश करूंगा। चूंकि पौधे औषधीय मूल्य रखते हैं, इसलिए इसका एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय बाजार है, "वे कहते हैं। 1987 में वापस, डगर ने सोनीपत में केवल 0.40 हेक्टेयर प्लॉट पर बेबी कॉर्न पेश किया था। आज सोनीपत में लगभग 485 हेक्टेयर भूमि बेबी मकई की खेती के तहत है।

वर्मीकंपोस्टिंग बेहतर पैदावार और रिटर्न लाता है - एक छोटा किसान रास्ता दिखाता है

महत्वपूर्ण बात यह है कि उसने कई अन्य किसानों को अनुकरण करने के लिए प्रेरित किया है। एक युवा किसान चंद्रना को पहले 'नर्सरी चंद्रना' और 'वर्मीकंपोस्ट चंद्रना' के नाम से जाना जाता है। उन्होंने तीन साल में वर्मीकंपोस्ट और गांडुड़ियों की बिक्री से 1.4 लाख रुपये कमाया है। अब यह उस क्षेत्र में एक परिकथा बन गया है जहां उनके जैसे छोटे किसान के लिए औसत वार्षिक कमाई 15000 रुपये से अधिक नहीं है। बड़ी उम्मीदों के साथ छोटे किसान चंद्रना का मामला दर्शाता है कि उत्सुक रुचि और आत्मविश्वास कृषि को एक भरोसेमंद उद्यम बना सकता है। क्योंकि यह रातोंरात सफलता की कहानी नहीं है बल्कि विभिन्न एजेंसियों से गांव में किसानों को दिए गए अवसरों का उपयोग करने के लिए एक व्यवस्थित प्रयास है। एक गरीब खेती परिवार से आते हुए चंद्रना को 3 एकड़ सूखी भूमि मिली है जिसमें से एक एकड़ बेकार भूमि है। मजदूरी श्रम, दो एकड़ भूमि में कृषि की तुलना में परिवार के लिए आजीविका का स्रोत अधिक महत्वपूर्ण था। उनके माता-पिता चाहते थे कि उनका एकमात्र बेटा अध्ययन करे। गरीबी के चलते उनके लिए पूर्व विश्वविद्यालय स्तर से परे जाना संभव नहीं था। उसे वापस लौटने और खेती में अपने माता-पिता से जुड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। कर्नाटक वॉटरशेड विकास (केएडएडएड) परियोजना में एएमई फाउंडेशन के साथ एक संसाधन एजेंसी के रूप में, चंद्रना एक स्व-सहायता समूह (एसएचजी) में शामिल हो गए। ट्रिगरिंग पॉइंट 2000 में चंद्रना ने टीपीआईएफ इंस्टीट्यूट ऑफ रूरल डेवलपमेंट, कर्नाटक (बीआईआरडी के) में टिपुर में नर्सरी बढ़ाने पर प्रशिक्षण में भाग लिया। लेकिन, वे वर्मीकंपोस्टिंग के बारे में जानना अधिक उत्सुक थे, एक ही समय में किसानों के दूसरे समूह के लिए समानांतर प्रशिक्षण सत्र आयोजित किया जा रहा था। जब भी संभव हो वह समूह में शामिल हुआ। वह गांडुड़ियों की देखभाल और वर्मीकंपोस्ट तैयार करने के बारे में उत्साहित हो गया। नर्सरी प्रशिक्षण से उनकी वापसी पर उनके समूह को 15,000 रोपण की नर्सरी बढ़ाने का अवसर दिया गया था। यह कार्य चंद्रना को सौंपा गया था। चंद्रना ने वर्ष 2000 से लगातार तीन वर्षों तक नर्सरी बधाई। 2003 में वॉटरशेड परियोजना में उनकी नर्सरी को सर्वश्रेष्ठ रेटिंग मिली और चंद्रन 'नर्सरी चंद्रना' के रूप में लोकप्रिय हो गए। एक मामूली शुरुआत और एक शानदार वृद्धि वर्मीकंपोस्टिंग के बारे में उनकी जिज्ञासा जारी रही। प्रशिक्षण के दौरान प्राप्त किए गए छोटे ज्ञान के साथ, उन्होंने नारियल के गोले में गांडुड़ियों की स्थानीय प्रजातियों को गुणा करने की कोशिश की। हालांकि वे जीवित नहीं रहे। 2003 में चंद्रना ने कवाड परियोजना के समर्थन के साथ 6x3x3 cu.ft के चार वर्मीकंपोस्ट पिट बनाए। । हालांकि वह नहीं जानता था कि पिट्स का उपयोग कैसे करें। गार्ड के एक कर्मचारी ने फिर चंद्रन को 2 किलो गांडुड़ियों ला दिए। चंद्रना को जिसकी लागत 300 रूपये हुई। उन्होंने 2 किलो गांडुड़ियों के साथ 20 क्विंटल वर्मीकंपोस्ट का उत्पादन किया। जिसे उन्होंने अपनी 2 एकड़ रागी फसल पर लगाया। रागी खुद तुम्करलाहल्ली में एक प्रयोग थी क्योंकि पहले गांव में कोई भी रागी नहीं उगता था। 2 एकड़ से उसे 14 क्विंटल मिला। 2004 में उन्होंने 2 एकड़ में अच्छी गुणवत्ता वाला 6 क्विंटल वर्मीकंपोस्ट और डीएपी के एक बैग के साथ FYM (2 टन) के 2 ट्रैक्टर लागू किया। इस बार उन्होंने मूंगफली की खेती की और 9 क्विंटल वजन वाले 20 बैग की उपज प्राप्त की। पेड़-आधारित कृषि प्रणालियों का दौरा करना जो कि कंपोस्टिंग और वर्मीकंपोस्टिंग में सफल रहे किसानों के साथ बातचीत करते हुए चंद्रना को स्थायी कृषि के बारे में व्यापक विचार प्राप्त करने में मदद मिली। उन्होंने बी जी केरे के पास के गांव में एक और प्रगतिशील किसान की अपनी यात्रा के साथ वर्मीकंपोस्टिंग के बारे में कुछ और सीखा। वर्ष 2005 मे चंद्रना ने एक एकड़ पीटीडी प्लॉट में गर्मियों में जोत, जैव एजेंटों (राइज़ोबियम और ट्रायकोडर्मा) के साथ बीज उपचार,जिप्सम (50 किग्रा) का उपयोग,सामान्य बीज दर (45 किलोग्राम) से अधिक का उपयोग करके, बढ़ती इंटरक्रॉप और सीमा फसलों, अभ्यास के संयोजन के सेट के साथ ६ क्विंटल वर्मीकंपोस्ट को लागू किया। मूंगफली उपज एक एकड़ से 13 बैग तक पहुंच गई जो उसे 6.5 क्विंटल दे रही थी। इस क्षेत्र में एएमईएफ के काम के पिछले चार वर्षों में एक किसान द्वारा एक एकड़ से दर्ज की गई उच्चतम उपज थी। उल्लेखनीय था कि प्रत्येक बैग का वजन 50 से 60 किलो के बीच था। जबकि चंद्रना के 25 बैग वजन 13 क्विंटल थे, उनके पड़ोसी टिपेस्वामी के 40 बैग, वजन केवल 13 क्विंटल थे। उत्पाद खरीदने वाले व्यापारी इस पर विश्वास नहीं कर सके। असल में व्यापारियों ने चंद्रन को बैग से बाहर सामग्री डालने के लिए मजबूर कर दिया ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि बैग में पत्थर नहीं थे। यह असामान्य था कि मूंगफली के फली का एक बैग का वजन 50 किलो से अधिक था। एकसमान फली परिपक्वता और उचित भरावट से मूंगफली की गुणवत्ता में काफी सुधार हुआ है। वर्मीकंपोस्टिंग, एक आकर्षक उद्यम चंद्रना वर्मीकंपोस्ट बनाने और इसे दो एकड़ जमीन पर लगाने के लिए नहीं रुक गये। उन्होंने 2004 से गांडुड़ियों और वर्मीकंपोस्ट दोनों को बेचना शुरू किया। 2004 में चंद्रना ने 150 रु प्रति किलो के दर से 124 किग्रा गांडुड़ियों बेचा। उनसे उन्होंने 18,600 रुपये कमाए। उन्होंने और 500 रु/ क्विंटल के दर से 15 क्विंटल वर्मीकंपोस्ट बेचकर 7500 रुपये कमाया। कुल मिलाके उन्होंने लगभग 26,100 रुपये कमाया। मूंगफली से एक की तुलना में अधिक आय से प्रेरित उन्होंने 2005 में कीड़े और खाद के उत्पादन और बिक्री को तेज कर दिया। इस प्रक्रिया में उन्होंने कुछ सबक कठिन तरीके से सीखा। उसने एक बार बिक्री के लिए 30 किलो गांडुड़ियों को मिट्टी में पैक किया, जो सौदा खत्म होने से पहले मर गए । बाद में उन्होंने गाय गोबर में पैक कीड़े बेचने लगे। जब वॉटरशेड प्रोजेक्ट ने अपने समापन वर्ष मंव बड़ी संख्या में किसानों को अधिक वर्मीकंपोस्ट पिट की पेशकश की तो गांडुड़ियों की मांग में और वृद्धि हुई। उन्होंने वर्मीकंपोस्टिंग पिट्स की संख्या में और वृद्धि की। उन्होंने अधिक फसल अवशेषों और कृषि अपशिष्टों की तलाश शुरू कर दी। अपने क्षेत्र में चार पोंगेमिया पेड़, नहर के साथ पेड़ों से बायोमास और सूखे नीलगिरी के पत्तों ने अपने वर्मीकंपोस्ट पिट्स के लिए कच्ची सामग्री प्रदान की। वर्मीकम्पोस्ट के लिए गाय का गोबर की जरूरत को समझते हुए चंद्रना ने बैल की एक जोड़ी , एक गाय और 20 मुर्गी रखना शुरू किया। रिटर्न लगातार बढ़ रहा है। निराशा के लिए आशा के संकेत उन्होंने अपने गांव के कई किसानों को सामान्य रूप से वैकल्पिक खेती प्रथाओं को आजमाने के लिए प्रेरित किया है और विशेष रूप से वर्मीकंपोस्टिंग लेने के लिए। चन्द्रना जैसे आत्म प्रेरित किसान सिर्फ ऐसे उत्प्रेरक हैं जो छोटी सफलताओं को बड़े पैमाने पर आंदोलनों में परिवर्तित करने के लिए एनजीओ की तलाश में हैं। यह सिर्फ सही तरह का आग्रह है कि कई संसाधन गरीब किसानों को सीमाओं और बाधाओं को दूर करने की आवश्यकता है।