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सेहत की संजीवनी गिलोय की खेती करना सीखे और बढ़ाये अपनी आय।

सेहत की संजीवनी गिलोय की खेती करना सीखे और बढ़ाये अपनी आय।

गिलोय (अंग्रेज़ी:टीनोस्पोरा कार्डीफोलिया) की एक बहुवर्षिय लता होती है। इसके पत्ते पान के पत्ते की तरह होते हैं। आयुर्वेद में इसको कई नामों से जाना जाता है यथा अमृता, गुडुची, छिन्नरुहा, चक्रांगी, आदि।[1] 'बहुवर्षायु तथा अमृत के समान गुणकारी होने से इसका नाम अमृता है।' आयुर्वेद साहित्य में इसे ज्वर की महान औषधि माना गया है एवं जीवन्तिका नाम दिया गया है। गिलोय की लता जंगलों, खेतों की मेड़ों, पहाड़ों की चट्टानों आदि स्थानों पर सामान्यतः कुण्डलाकार चढ़ती पाई जाती है। नीम, आम्र के वृक्ष के आस-पास भी यह मिलती है। जिस वृक्ष को यह अपना आधार बनाती है, उसके गुण भी इसमें समाहित रहते हैं। इस दृष्टि से नीम पर चढ़ी गिलोय श्रेष्ठ औषधि मानी जाती है। इसका काण्ड छोटी अंगुली से लेकर अंगूठे जितना मोटा होता है। बहुत पुरानी गिलोय में यह बाहु जैसा मोटा भी हो सकता है। इसमें से स्थान-स्थान पर जड़ें निकलकर नीचे की ओर झूलती रहती हैं। चट्टानों अथवा खेतों की मेड़ों पर जड़ें जमीन में घुसकर अन्य लताओं को जन्म देती हैं।

बेल के काण्ड की ऊपरी छाल बहुत पतली, भूरे या धूसर वर्ण की होती है, जिसे हटा देने पर भीतर का हरित मांसल भाग दिखाई देने लगता है। काटने पर अन्तर्भाग चक्राकार दिखाई पड़ता है। पत्ते हृदय के आकार के, खाने के पान जैसे एकान्तर क्रम में व्यवस्थित होते हैं। ये लगभग 2 से 4 इंच तक व्यास के होते हैं। स्निग्ध होते हैं तथा इनमें 7 से 9 नाड़ियाँ होती हैं। पत्र-डण्ठल लगभग 1 से 3 इंच लंबा होता है। फूल ग्रीष्म ऋतु में छोटे-छोटे पीले रंग के गुच्छों में आते हैं। फल भी गुच्छों में ही लगते हैं तथा छोटे मटर के आकार के होते हैं। पकने पर ये रक्त के समान लाल हो जाते हैं। बीज सफेद, चिकने, कुछ टेढ़े, मिर्च के दानों के समान होते हैं। उपयोगी अंग काण्ड है। पत्ते भी प्रयुक्त होते हैं।

ताजे काण्ड की छाल हरे रंग की तथा गूदेदार होती है। उसकी बाहरी त्वचा हल्के भूरे रंग की होती है तथा पतली, कागज के पत्तों के रूप में छूटती है। स्थान-स्थान पर गांठ के समान उभार पाए जाते हैं। सूखने पर यही काण्ड पतला हो जाता है। सूखे काण्ड के छोटे-बड़े टुकड़े बाजार में पाए जाते हैं, जो बेलनाकार लगभग 1 इंच व्यास के होते हैं। इन पर से छाल काष्ठीय भाग से आसानी से पृथक् की जा सकती है। स्वाद में यह तीखी होती है, पर गंध कोई विशेष नहीं होती। पहचान के लिए एक साधारण-सा परीक्षण यह है कि इसके क्वाथ में जब आयोडीन का घोल डाला जाता है तो गहरा नीला रंग हो जाता है। यह इसमें स्टार्च की उपस्थिति का परिचायक है। सामान्यतः इसमें मिलावट कम ही होती है, पर सही पहचान अनिवार्य है। कन्द गुडूची व एक असामी प्रजाति इसकी अन्य जातियों की औषधियाँ हैं, जिनके गुण अलग-अलग होते हैं।

औषधीय गुणों के आधार पर नीम के वृक्ष पर चढ़ी हुई गिलोय को सर्वोत्तम माना जाता है क्योंकि गिलोय की बेल जिस वृक्ष पर भी चढ़ती है वह उस वृक्ष के सारे गुण अपने अंदर समाहित कर लेती है तो नीम के वृक्ष से उतारी गई गिलोय की बेल में नीम के गुण भी शामिल हो जाते हैं अतः नीमगिलोय सर्वोत्तम होती है।

! जलवायु और मिट्टी!
पौधे उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय जलवायु में बढ़ते हैं। पौधे कार्बनिक पदार्थों से समृद्ध हल्के मध्यम रेतीले दोमट मिट्टी में  होते हैं और पर्याप्त जल निकासी के साथ, इसकी खेती के लिए उपयुक्त हैं। यह उच्च वर्षा या जलभराव की स्थिति को सहन नहीं करता है। भूमि को जोता जाता है, कठोर किया जाता है और खरपतवार मुक्त किया जाता है।

! भूमि की तैयारी !
भूमि तैयार करने के समय FYM (खेत की खाद) 10 टन प्रति हेक्टेयर की और नाइट्रोजन की आधी (75 किग्रा) एक  बुनियादी खुराक लगाई जाती है।

! प्रसार !
बीज और वनस्पति कलमों द्वारा प्रसारित। व्यावसायिक फसल उगाने के लिए तने कटिंग सर्वोत्तम रोपण सामग्री है। कलमों को मई-जून में मदर प्लांट्स से प्राप्त किया जा सकता है। 6 से 8 इंच लंबाई वाले छोटे उंगली की मोटाई वाले कटिंग में 2 या 3 नोड होते हैं। स्वस्थ पौधों के तने की कटाई को सीधे तैयार खेत में बोया जाता है। 
 नर्सरी विधि से पौधों की कटाई के लिए , फरवरी - मार्च के दौरान 4 इंच × 6 इंच आकार के पॉली बैग में लगाए जाते है। पॉली बैग को 1: 1: 1 के अनुपात में मिट्टी, रेत और सूखे गाय के गोबर या वर्मीकम्पोस्ट से भरा जाता है । कटिंग की जड़ को लगभग 15 से 25 दिन लगते हैं। कटिंग मई-जून के महीने में मुख्य खेत में रोपण के लिए तैयार हो जाएगी।

! रोपाई !
 एक हेक्टेयर भूमि में वृक्षारोपण के लिए लगभग 2500 कटिंग की आवश्यकता होती है। बेहतर उपज के लिए 3 मीटर × 3 मीटर की इष्टतम रिक्ति की सिफारिश की जाती है। पौधे को बढ़ने के लिए सहारा की आवश्यकता होती है, जो लकड़ी के दांव या ट्रेलिस को बढ़ाकर प्रदान किया जा सकता है। पहले से ही बढ़ती झाड़ियों या पेड़ पौधों को भी सहारा दे सकते हैं। यह नीम और आम के पेड़ों जैसे अधिमानतः पेड़ों का समर्थन करता है। ऐसे पौधों को बेहतर औषधीय मूल्यों के अधिकारी माना जाता है।

! सिंचाई!
फसल वर्षा आधारित परिस्थितियों में उगाई जाती है। हालांकि, अत्यधिक ठंड और गर्म मौसम के दौरान कभी-कभी सिंचाई से फसल को प्रतिकूल परिस्थितियों से बचाने में मदद मिल सकती है।

! कटाई!
शरद ऋतु के दौरान तने को काटा जाता है जब यह 2.5 सेमी से अधिक के व्यास में विकसित होता है। आगे के विकास के लिए बेसल भाग को छोड़ दिया जाता है। स्टेम को छोटे टुकड़ों में काटा जाना चाहिए और छाया में सुखाया जाना चाहिए। इसे गनी बैग में रखा जा सकता है और इसे ठंडे और हवादार भंडारण गोदामों में रखा जा सकता है। स्पर्श से भी छाल के छिलके उतर जाते हैं। इस प्रकार, तने को बहुत सावधानी से काटा जाना चाहिए क्योंकि छिलके वाला तना बहुत जल्द निकल जाता है। औसतन किसान को औसतन 8-10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज मिल रही है और एक किलोग्राम सूखे तने की दर 25-35 रुपये है।