Special Story


| मटर की खेती करके लखपति बने किसान सुशील कुमार की सफलता की कहानी।

| मटर की खेती करके लखपति बने किसान सुशील कुमार की सफलता की कहानी। श्री सुशील कुमार बिंद उत्तर प्रदेश के ब्लॉक मरहना जिला मिर्ज़ापुर के गाँव बहुती में एक मामूली किसान हैं। उसके पास खेती के लिए लगभग एक हेक्टेयर भूमि है। इससे पहले, वह एक चिंतित किसान था और अपने परिवार की आवश्यकता को पूरा करने में असमर्थ था। उनके जीवन में एक परिवर्तन हुआ जब उन्होंने वाराणसी के भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान (IIVR) में किसान मेले में भाग लिया और सब्जी वैज्ञानिकों के साथ बातचीत की। उन्हें पता चला कि यूपी के पूर्वी हिस्सों में प्रचलित चावल-गेहूं की फसल प्रणाली में सब्जी मटर की शुरुआती किस्में बहुत अच्छी तरह से मिलती हैं। इसके अलावा, उन्हें एनएआईपी उप परियोजना के तहत मदद प्रदान की गई थी - पूर्वांचल के नुकसान वाले जिलों में आजीविका सुरक्षा। परियोजना के तहत, उन्होंने गुणवत्ता वाले बीज और उर्वरक प्राप्त किए। उन्होंने IIVR के वैज्ञानिकों की देखरेख में सब्जी की खेती शुरू की। IIVR के वैज्ञानिकों ने उनसे कहा कि वे अपनी पूरी भूमि में मटर की खेती करें, वह सहमत हो गए। उन्होंने भूमि की तैयारी के साथ शुरू किया, सबसे पहले उन्होंने अपनी जमीन की जांच की और खेत की गहरी जुताई की। उन्होंने अनावश्यक खरपतवार और कीटों को नष्ट करने के लिए जैविक उर्वरक (गोबर खाद) और अपनी भूमि की सिंचाई की। भूमि की तैयारी के बाद, उन्होंने पिछले अक्टूबर में काशी उदय और काशी नंदिनी की बुवाई की। बीज बहुत जल्द अंकुरित होते हैं। उसने पौधे की देखभाल शुरू कर दी और सभी अवांछित खरपतवारों को नष्ट कर दिया। एक महीने के बाद, फूल खिलना शुरू हो गया और फलने फूलने लगे। श्री सुशील कुमार बिंद ने दिसंबर के महीने में मटर की फलियों को चुनना शुरू किया और 25-35 रुपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से बाजार में बेच दिया। दिसंबर के महीने में, उन्होंने लगभग 1200 किलोग्राम मटर की फली की बिक्री से 40.000 रु मिले। जनवरी के महीने में, फसल का उत्पादन बहुत अधिक था और फली की चार पिकिंग के माध्यम से, उन्होंने लगभग 3500 किलोग्राम ताजा मटर की फली एकत्र की। उस समय उन्होंने मंडी में उपज @ Rs.15-20 प्रति किलो बेचकर लगभग 57,500 रुपये कमाए। फरवरी के महीने में, मटर की फली की कीमत में गिरावट आई है, इसलिए उन्होंने मटर की फली को केवल दो बार उठाया। उन्होंने लगभग 1500 किग्रा की फसल ली और इसे 5-10 रुपये प्रति किलो में बेच दिया और करीब 11,250 रुपये मिले। उसके बाद उन्होंने फसल को बीज उत्पादन के लिए छोड़ दिया। अंत में, उन्होंने बीज के रूप में लगभग 2500 किलोग्राम एकत्र किया। उन्होंने बीज की बिक्री से एक 15,000 रुपये कमाए। श्री सुशील कुमार ने मटर की बिक्री से लगभग 1,23,750 रुपये कमाए हैं। उन्होंने 5000 / - बीज, 10000 / - परिवहन पर, 1000 / - सिंचाई पर और 2000 / - भूमि की तैयारी पर और 5000 / - उर्वरक के लिए खर्च किए। संक्षेप में, उन्होंने लगभग 23000 / - रु खर्च किए और मटर की खेती से कम समय में एक लाख रुपए कमाए। अब, वह अपनी पूरी भूमि में मीठे मटर की खेती करने की योजना बना रहा है। अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए वह नियमित रूप से सब्जी वैज्ञानिकों के संपर्क में रहता है। वह सब्जी की खेती के लिए अन्य किसानों को भी प्रेरित करता है। भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान, वाराणसी ने मटर की खेती के माध्यम से पूर्वांचल के किसानों के लिए समृद्धि लाई है। IIVR के वैज्ञानिकों ने वनस्पति मटर पर कठोर प्रयोग किया है और दो उच्च उपज देने वाली किस्मों काशी उदय और काशी नंदिनी का विकास किया है। ये किस्में न केवल शुरुआती हैं बल्कि उच्च उपज भी हैं। काशी उदय लगभग 750-900 किलोग्राम / हेक्टेयर उत्पादन देता है जबकि काशी नंदिनी की उपज क्षमता 900-110 किलोग्राम / हेक्टेयर है। इन किस्मों में रोग प्रतिरोधक क्षमता भी अधिक होती है।

।श्रीमती चेनम्मा: इनोवेटिव वेजिटेबल किसान, कर्नाटक की सफलता की कहानी।

।श्रीमती चेनम्मा: इनोवेटिव वेजिटेबल किसान, कर्नाटक की सफलता की कहानी। श्रीमती चेनम्मा अंतराहल्ली, ट्यूबगेरे होबली, डोड्डाबल्लापापट्टलुक, बैंगलोर ग्रामीण जिला में रहती है। उसके पास 7 एकड़ (सिंचित 3.5 एकड़: वर्षा आधारित 1.5 एकड़ और कृषि-वानिकी (नीलगिरी) 2 एकड़) जमीन है। उसका कृषि और बागवानी के क्षेत्र में 10 वर्ष का अनुभव है। उसने 2006 से फ्रेंच बीन्स, टमाटर, मटर, मूली, बैंगन, मिर्च और हरी पत्तेदार सब्जियां उगाना शुरू कर दिया। पहले वे रागी, ज्वार और सूरजमुखी जैसी खेतों की फसल उगाते थे। उसी समय वह अपने गाँव में एक सेल्फ हेल्प ग्रुप चलाती है और निगरानी करती है। वह इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ हॉर्टिकल्चर रिसर्च, बैंगलोर (ArkaSuvidha, ArkaKomal & ArkaAnoop)फ्रेंच बीन्स की उन्नत किस्मों ऊगा रही है। तीनों किस्में अंतराहल्ली, ट्यूबगेरेहोबली, डोड्डाबल्लपुरा में तीन साल तक अपने खेत में उगाई गईं। उपज (औसत 3 वर्ष) और आर्थिक विवरण नीचे दिए गए हैं। क्रम फ़सल किस्मों उपज शुद्ध प्रतिफल 1 फ्रेंच बीन्स अरका कोमल 16.5 टन / हेक्टेयर 1,40,000 2 फ्रेंच बीन्स अरका अनूप 17.4 टन / हेक्टेयर 1,49,000 3 फ्रेंच बीन्स अरका सुविधा 16.7 टन / हेक्टेयर 1,58,700 श्रीमती चेनम्मा जिस क्षेत्र में बागवानी करती हैं वह मुख्यतः बागवानी क्षेत्र है। फ्रेंच बीन्स की पैदावार,16.5 से लेकर 17.4 टन / हेक्टेयर है, जो गांवों में सबसे अधिक है। अरका सुविधा किस्म ने बाजार में अधिक कीमत प्राप्त की क्योंकि यह एक कठोर किस्म है। जब भी मजदूरों की समस्या होती है तो कटाई 5 दिनों के अंतराल के बाद भी की जा सकती है क्योंकि इस किस्म के फल इसकी गुणवत्ता को कम नहीं करते हैं। पैदावार में अरका अनूप सबसे अच्छा पाया जाता है। वे 6,960 किलोग्राम / एकड़ प्राप्त कर सकते थे जो जंग और बेक्टेरियल नुक़सान जैसी महत्वपूर्ण बीमारियों के लिए भी प्रतिरोधी था। अरका अनूप और अरका कोमल (जहां उन्होंने 10 रुपये / किलोग्राम प्राप्त किए) की तुलना में उन्हें अरका सुविधा के लिए लगभग 11 रुपये / किलोग्राम का बाजार मूल्य मिला। वह अब अपने अतिरिक्त गुणों और उच्च उपज के कारण अरका अनूप और अरका सुविधा को उगाना पसंद करती है। किसान के अनुसार अरका अनूप और अरका सुविधा में खाना पकाने की अच्छी गुणवत्ता है। अरका सुविधा बाजार में उच्च मूल्य प्राप्त करती है क्योंकि यह कठोर होती है और कामकाजी महिलाओं द्वारा पसंद की जाती है। पहले श्रीमती चेनम्मा एक छोटे समय के किसान के रूप में अपनी सब्जियों को बैंगलोर के महत्वपूर्ण बाजारों में बिक्री के लिए लाती थी। एक बार जब वह बड़े पैमाने पर बढ़ने लगी और पड़ोसी सब्जी विक्रेताओं को श्रीमती चेनम्मा के क्षेत्र में उगाई गई सब्जी की उपज और गुणवत्ता के बारे में पता चला। इसलिए विक्रेता उसकी जगह पर आते हैं और उपज खरीदते हैं। उसने गाँव और पड़ोसी गाँव में भी अन्य किसानों को प्रेरित किया है। वर्ष 2005 के दौरान IIHR द्वारा प्रदर्शनों के लिए उन्नत किस्मों के बीज प्रदान किए गए थे। इन किस्मों के प्रदर्शन को जानने के बाद श्रीमती चेनम्मा ने IIHR के वैज्ञानिक के साथ मुलाकात की और बीज की खरीद की। उसने 2006 से उन्नत किस्मों को उगाना शुरू किया और वह लगातार उच्च पैदावार का साकार कर रही है। श्रीमती चेनम्मा लगातार IIHR के विस्तार प्रभाग के संपर्क में थीं और अनुवर्ती के रूप में विस्तार वैज्ञानिक ने नियमित रूप से उनके क्षेत्र का दौरा किया। उसे सभी जरूरत आधारित ज्ञान और कौशल प्रदान किए गए हैं, जिसमें IIHR के वैज्ञानिक डॉ.एम.आर.हैगड़े और डॉ.साजू जॉर्ज द्वारा उर्वरक और कीट प्रबंधन का संवर्धन शामिल है। चेन्नम्मा मेहनती किसान हैं और वे प्रौद्योगिकियों को तेजी से समझकर उसे अपनाने में सक्षम हैं। वह खेत और विपणन के काम करने के लिए पूरे दिन सक्रिय रूप से शामिल है। नई किस्म की क्षमता को देखने के बाद, चेनम्मा ने चालू वर्ष में बीज उत्पादन शुरू कर दिया है। उत्पन्न बीज पड़ोसी किसानों को आपूर्ति किए जाते थे। वह नई तकनीकों को अपनाने में अन्य किसानों को सक्रिय रूप से मार्गदर्शन भी देते थे। उसके हस्तक्षेप से उन्होंने गांव में एक मौसम में विभिन्न सब्जियों की फसल उगाना शुरू कर दिया है और इसके परिणामस्वरूप वे बाजार में बेहतर कीमत प्राप्त कर रहे हैं। मटर और टमाटर के मामले में वह अब फूल अवस्था के दौरान पंचगव्य का उपयोग कर रही है, उनके अनुसार यह फूल गिरने के नियंत्रण में प्रभावी पाया गया। पंचगव्य : 5 किलोग्राम गाय के गोबर, 10 लीटर गाय के मूत्र, 1 लीटर दही, 1 लीटर दूध, 1 किलो घी को 15 दिनों के लिए रखा जाता है, जबकि वह 1:10 अनुपात (पंचगव्य: जल) की मिश्रित संरचना का छिड़काव किया जाता है। यहां IIHR की यात्रा के दौरान उन्हें टमाटर, बीन्स अन्य सब्जियों के लिए विशेष सब्जी के बारे में पता चला। सब्जी विशेष की अनुशंसित खुराक टमाटर के लिए 15 लीटर पानी में 1 शैम्पू पाउच और 2 मध्यम आकार के नींबू के साथ 75 ग्राम है। फ्रेंच बीन्स के लिए यह 2 ग्राम प्रति लीटर है। वह अब नियमित रूप से सब्जी विशेष का उपयोग कर रही है क्योंकि उसने देखा है कि फल की गुणवत्ता, पौधे की रोग प्रतिरोधक क्षमता में सुधार होता है। यह फूलों की अधिक संख्या को बनाए रखने में भी मदद करता है, इस प्रकार फल सेट में वृद्धि से अधिक उपज होती है। मिट्टी को समृद्ध करने के लिए उसने दोनों जैव-उर्वरक (फॉस्फेट सोलूबिलाइजिंग बैक्टीरिया (PSB), एजोस्प्रिलियम & एजोटोबैक्टर) और जैव-कीटनाशकों (का उपयोग करना शुरू कर दिया। वह अन्य उन्नत किस्मों को भी उगाना शुरू कर रही है, बैंगन: अरका अनंद (IIHR से एक संकर हरी लंबी बैंगन, जो कि बैक्टीरिया के विल्ट के लिए प्रतिरोधी है), मिर्च: अरका मेघना और अरका श्वेत।

। एक वकील-किसान की प्रेरक कहानी ।

। एक वकील-किसान की प्रेरक कहानी । 40 वर्षीय हेमचंद्र दगाजी पाटिल वकील की जगह किसान बन गए इसका उसे कोई पछतावा नहीं है। हेमाचंद्र के पिताजी के पास गांव में 30 एकड़ खेत थे उसमे फसल की पैदावार में गिरावट आ गयी थी और उसकी देखभाल करने वाला कोई नहीं था। इस कारण आखिरकार हेमाचंद्र अदालत छोड़कर गांव में आना पड़ा। हेमाचंद्र पिता एक सेवानिवृत्त स्कूल शिक्षक थे उसने उनसे कृषि संकट का हल खोजने का आग्रह किया। उसके लिए यह निर्णय लेना कठिन था, जब एक आकर्षक कैरियर उसका इंतजार कर रहा था। लेकिन हेमाचंद्र ने उम्मीद नहीं खोई। उन्होंने इसे एक चुनौती के रूप में लिया और विश्वास था कि वह परिवार की किस्मत को बदल सकते हैं। शुरुआती दिन लंबे और थका देने वाले थे। बाढ़ सिंचाई पर निर्भर होने के कारण, उन्हें खेत में पानी की आपूर्ति की जाँच करने और इसे नियंत्रित करने में कई रातें बितानी पड़ीं। लेकिन पैदावार वही रही। उन्होंने खेती और आधुनिक तकनीकों पर अधिक ज्ञान हासिल करने के लिए सेमिनारों में भाग लेना शुरू कर दिया। अंत में बड़ा बदलाव 2000 में आया जब उन्होंने जैन इरिगेशन द्वारा आयोजित एक सेमिनार में भाग लिया। कंपनी जलगांव में हर साल किसानों के लिए मुफ्त प्रदर्शन करती है। एग्रो फूड्स, जैन इरीगेशन के अध्यक्ष दिलीप कुलकर्णी कहते हैं की "कंपनी जलगांव में अपने मुख्यालय में हर साल पूरे भारत में 40,000 किसानों को आमंत्रित करती है। यात्रा का खर्च कंपनी द्वारा वहन किया जाता है। नई प्रौद्योगिकियों के लिए मार्गदर्शन और एंड-टू-एंड समाधान के अलावा, जैन इरिगेशन का बैंकों के साथ गठजोड़ भी है जिससे किसानों को मदद मिल सके। हेमाचंद्र को ड्रिप सिंचाई प्रणाली की सफलता के बारे में सुनकर अच्छा लगा। उसे पता था कि इससे खेतों और उसके जीवन में सुधार होगा। ड्रिप सिंचाई का उपयोग करके उसे बहुत अच्छे परिणाम मिले। इससे पहले बहुत सारे पानी और उर्वरक भी बर्बाद हो गए थे क्योंकि उनके पास प्रत्येक फसल के लिए एक निश्चित सीमा नहीं थी। अतिरिक्त उर्वरक फसल के लिए खराब थे और साथ ही मिट्टी को भी ख़राब करते थे। उन्हों ने फर्टिगेशन में उर्वरक की आवश्यक मात्रा को पानी के साथ मिलाया और आपूर्ति की। उससे मजदूरों की संख्या में भी कटौती हुई। उससे उन्हें अविश्वसनीय परिणाम मिले। पिछली फसल की तुलना में फसल की पैदावार लगभग दोगुनी थी। हेमाचंद्र बताते हैं, "माइक्रो-सिंचाई और फर्टिगेशन से हमें पैदावार और हमारी वित्तीय स्थिति बढ़ाने में मदद मिली।" प्याज की पैदावार 8-10 टन / एकड़ से बढ़कर 18 टन हो गई जबकि केले की उपज 18-20 टन / एकड़ से बढ़कर 30-35 टन हो गई। आमदनी 20,000-25,000 प्रति एकड़ / वर्ष थी जो 50,000 रु। - 60,000 रु। प्रति एकड़ / वर्ष रु हो गयी। हेमाचंद्र आसपास के अन्य किसानों की मदद करने की भी कोशिश करते हैं। वह ज्ञान और तकनीक साझा करता है ताकि वे अपनी फसल की उपज में सुधार कर सकें। कम से कम 10 किसान उनसे मिलने आते हैं। जैन इरिगेशन द्वारा शुरू की गई कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का एक हिस्सा होने के नाते, उनके जैसे किसानों के लिए एक आशीर्वाद रहा है। जैन इरिगेशन ने महाराष्ट्र में 5,000 किसानों के साथ समझौता किया है। "अनुबंध किसानों को एक बायबैक गारंटी की पेशकश की जाती है। कंपनी द्वारा तय की गई एक न्यूनतम समर्थन मूल्य है। कीमत में उतार-चढ़ाव के बावजूद, किसानों को उनकी उपज के लिए एक निश्चित दर मिलती है। उनकी रिकॉर्ड तोड़ प्रगति ने जैन इरिगेशन के शीर्ष मालिकों को प्रभावित किया, जिन्होंने उन्हें हार्वर्ड में एक सेमिनार में भाग लेने के लिए चुना। उन्हें इस बारे में बोलना था कि कैसे प्रौद्योगिकी ने छोटे किसानों के जीवन को बदल दिया है। हार्वर्ड में जाना उनके शानदार कृषि कैरियर का सबसे अविस्मरणीय अध्याय है। भविष्य के बारे में आशावादी, हेमाचंद्र कहते हैं, "मैं एक पॉलीहाउस बनाने की योजना बना रहा हूं, जहां फसलों को उगाने के लिए तापमान को नियंत्रित किया जा सके। लेकिन इसके लिए एक बड़े निवेश की आवश्यकता होती है। बैंक अपने उद्यम का समर्थन करने के लिए तैयार नहीं हैं। मैं बागवानी पर भी ध्यान देना चाहता हूं।" आशा है कि मैं प्रयोग और सफल होने के लिए पर्याप्त कमा सकता हूं।

|| राजस्थान की महिला 1.25 एकड़ बंजर भूमि पर अनार और सेब की खेती कर 25 लाख कमा रही है ||

|| राजस्थान की महिला 1.25 एकड़ बंजर भूमि पर अनार और सेब की खेती कर 25 लाख कमा रही है || संतोष देवी केदार की यात्रा इस एक बंजर 1.25 एकड़ भूमि के साथ शुरू हुई, जो हर साल बीज, उर्वरक और श्रम के खर्चों के लिए मुश्किल से पर्याप्त उत्पादन करती थी। उनकी शादी राम करन से 1990 में 15 साल की उम्र में हुई। वह खेती से प्यार करते थे और हमेशा अपने ससुराल में भी खेत में काम करने के इच्छुक थे। हालांकि, यहां चीजें वास्तव में अलग थीं। संतोष बताते है के "मेरे दादा के खेत में हम कभी रासायनिक उर्वरकों का उपयोग नहीं करते थे, और फिर भी हमेशा अच्छी उपज होती थी। लेकिन यहां वर्षों से रसायनों के उपयोग के कारण खेत लगभग बांझ था। चारों ओर पानी का कोई स्रोत नहीं था, और केवल ज्वार और बाजरा जैसी पारंपरिक उपज उगाई जाती थी। कई सालों तक संतोष ने परंपरागत तरीके से राम करण का अनुसरण किया। लेकिन जब परिवार अलग हो गया, और परिवार के वित्त में योगदान नहीं करने के लिए उन पर ताना मारा गया, तो उन्होंने चीजों को अपने हाथों में लेने का फैसला किया। संतोष ने खेत में मेहनत करना शुरू कर दिया। सबसे पहले, उसने जंगली घास के खेत को साफ किया। उसने मिट्टी में रासायनिक खाद मिलाना भी बंद कर दिया और उन्हें जैविक से बदल दिया। राम करन ने भी नौकरी के घंटों के बाद खेत में योगदान दिया। हालांकि उनके प्रयास पर्याप्त नहीं थे। पारंपरिक फसलों ने उन्हें इतना नहीं कमाया कि वे अपने बच्चों को खिला सकें। दंपति ने 8000 रुपये में अनार के 220 पौधे खरीदे। हालांकि उनके पास उदयन केंद्र की सब्सिडी की मदद नहीं थी, फिर भी उन्हें पूरी राशि जुटाने के लिए अपनी एकमात्र भैंस बेचनी पड़ी। दंपति ने बचे हुए पैसों से खेत में एक नलकूप भी स्थापित किया। संतोष ने पानी की कमी वाले क्षेत्र में ड्रिप सिंचाई पद्धति का उपयोग करने का निर्णय लिया। संतोष कहते है की, उन दिनों गाँव में बिजली नहीं थी। इसलिए हमें एक जनरेटर किराए पर लेना पड़ा। मैं जेनरेटर चलाने के लिए केरोसिन लेने के लिए अपने पड़ोसियों का राशन कार्ड उधार लेता हूँ। हमारे बच्चे स्कूल से वापस आने के बाद हमारे साथ काम करते है, और हम लगातार चीजों को काम करने के तरीकों की तलाश में थे। यह एक कठिन समय था, हमने हर संभव कोशिश की लेकिन कभी हार नहीं मानी। संतोष ने अपने खेती के अनुभव के ज्ञान के साथ-साथ अपने साथी किसानों से मिले सुझावों का इस्तेमाल किया और जैविक खाद बनाना शुरू किया। हर पौधे को हर छह महीने में इस प्राकृतिक उर्वरक का 50 किलोग्राम दिया जाता था। संतोष ने लेयर-कटिंग तकनीक भी आजमाई। एक बार फ्रूटिंग शुरू हो जाने के बाद, वह सभी नई शाखाओं को काट लेती है, जिसका केवल एक ही पैर बरकरार रहता है। इससे यह सुनिश्चित हो गया कि पौधे को दिया जाने वाला पोषण नई शाखाओं में नहीं बल्कि फल में जा रहा है। तीन वर्षों के निरंतर प्रयासों और कड़ी मेहनत के बाद, युगल को अंततः 2011 में इसका फल मिला, जब उनके अनार की पहली उपज ने उन्हें 3 लाख का लाभ कमाया! संतोष ने कहा, " जिन पौधों की छंटनी की गई थी, वे नियमित रूप से बेहतर और भारी फल देते है इसलिए हमने अगले सत्र में सभी पौधों के लिए इस तकनीक को लागू किया।" वह जैविक कीटनाशकों के लिए गुड़ भी इस्तेमाल करते है। यह तकनीक फूलों की तरफ मधुमक्खी को आकर्षित करती है और इस प्रकार अधिक परागण का परिणाम होता है। साथ ही जैविक उर्वरकों के निरंतर उपयोग ने मिट्टी को उपजाऊ बनाया और अधिक केंचुओं को भी आमंत्रित किया। ड्रिप तकनीक को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए पौधों के चारों ओर तीन फीट की आड़ू के पेड़ों की एक सीमा बनाते है जो मिट्टी को लंबे समय तक नम रखता है। आड़ू के पेड़ों को ज्यादा पानी की आवश्यकता नहीं होती है। पेड़ों की छाया पौधों को अत्यधिक गर्मी और ठंड से बचाती है। साथ ही उनकी जड़ों में कैल्शियम की मात्रा मिट्टी की कैल्शियम की आवश्यकता को पूरा करती है। ये सभी प्रयास सफल रहे, और फलों की मात्रा और आकार में सुधार होने लगा। धीरे-धीरे उन्होंने खेत में नींबू, किन्वार (मैंडरीन हाइब्रिड), बेल (लकड़ी का सेब) भी लगाया। हालांकि गाँव को 2013 में बिजली मिली थी, लेकिन दंपति ने अपने खेत में सौर पैनल लगाए। अब उनका अधिकांश कार्य सौर ऊर्जा के साथ और अतिरिक्त लागत को कम करने के लिए किया जाता है। वे बिचौलियों को एक फल भी नहीं बेचते हैं। सभी फल ग्राहकों को सीधे खेत में बेचे जाते हैं, और इसलिए उन्हें अपना कोई भी लाभ साझा नहीं करना पड़ता है। पहले फलने के दौरान, राम करण ने सभी अधिकारियों, शोरूम मालिकों और स्वाद परीक्षण के लिए हर संभव फल लिया। उनके खेत में उगाए गए अनार बाजार में उपलब्ध लोगों की तुलना में बड़े और मीठे थे। इस प्रकार, युगल ने अपने स्मार्ट मार्केटिंग रणनीति की मदद से एक नियमित ग्राहक विकसित किया। उनकी सफलता को देखते हुए, गाँव के अन्य किसानों को भी अनार के पौधे उगाने लगे; हालाँकि, उनमें से ज्यादातर असफल रहे। इसके बाद ये किसान मदद के लिए संतोष और राम करन के पास पहुंचे। दंपति को पता चला कि जिन पौधों को उन्होंने शुरू में खरीदा था वे उत्कृष्ट गुणवत्ता के थे, और दुर्भाग्य से अब उपलब्ध नहीं हैं। दंपति ने नए वृक्षों के लिए अपने पेड़ों से ग्राफ्ट काटना शुरू किया और 2013 में 'शेखावाटी कृषि फार्म और नर्सरी' शुरू किया। यह खेत अब पहले सीजन अगस्त-सितंबर में लगभग 50 किलोग्राम और दूसरे सीजन में नवंबर-दिसंबर में 30-40 किलोग्राम प्रति पौधा अनार का उत्पादन करता है। जबकि पारंपरिक रूप से उगाए गए अनार का वजन 400 ग्राम है, शेखावाटी के प्रत्येक अनार का वजन लगभग 700-800 ग्राम है। फार्म अनार को 100 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बेचता है और उसी के लिए प्रति वर्ष लगभग 10 लाख रुपये कमाता है। मोसम्बी के पौधों ने भी फल उगाना शुरू कर दिया है, जिससे उन्हें 1 लाख रुपये का सालाना मुनाफा होता है। दूसरे फलों से उन्हें हर साल 60,000-70,000 रुपये मिलते हैं। इसके अलावा दंपति इन फलों के पौधे बेचकर नर्सरी से 10-15 लाख रुपये का अतिरिक्त लाभ कमाने का दावा करते हैं। संतोष ने बताया की हिमाचल के एक इनोवेटर किसान, श्री हरमन जीत सिंह, 2016 में हमारे खेत का दौरा करने आए थे। उन्होंने हमें एक प्रकार का सेब का पौधा भेंट किया जो उन्होंने विकसित किया था जिसे राजस्थान जैसे गर्म क्षेत्रों में खेती की जा सकती है। संतोष ने इस पौधे को कोई अतिरिक्त देखभाल नहीं दी। उन्होंने शुरू में एक पॉली बैग में सेब का पौधा लगाया और फिर संतोष पौधे में बचे हुए जैविक उर्वरक, कीटनाशक और टॉनिक मिलाये। धीरे-धीरे पौधा संतोष की देखभाल के तहत समृद्ध हुआ जिसने उस पर अपनी काटने की तकनीक का भी इस्तेमाल किया। पौधे ने इस साल फलाना शुरू किया। 2016 में संतोष देवी को खेती में नवीन तकनीकों के लिए 'कृषि मंत्र पुरस्कार' से सम्मानित किया गया। उन्हें इस सम्मान के साथ 1 लाख पुरस्कार राशि भी मिली।

इंफोसिस कंपनी छोड़कर गुलाब की खेती शुरू की, दो महीने में 30 लाख रु. कमाए

किसानों का रुझान डच गुलाब की खेती की ओर बढ़ा है। उच्च शिक्षित युवा भी गुलाब की खेती करने लगे हैं। बीगोद निवासी आशुतोष पारीक ने बीटेक कर जयपुर में इंफोसिस कंपनी में 12 लाख के पैकेज पर नौकरी की। कुछ समय बाद नौकरी छाेड़कर खेती करना शुरू किया। पैतृक जमीन पर पारंपरिक खेती करते हुए सब्जियां उगाई। आशुतोष ने दो साल पहले फूलों की खेती शुरू की। डेढ़ एकड़ के पॉलीहाउस में 45 हजार पौधे फूलों के लगाए। इनमें रेड रोज, व्हाइट रोज, येलो रोज, औरेंज रोज आदि अलग-अलग किस्म शामिल हैं। इस साल जनवरी व फरवरी में करीब 30 लाख रुपए की आय हुई। पढ़ाई के साथ जाता था कृषि कार्यशालाओं में : आशुतोष ने बताया कि पढ़ाई के दौरान मैंने खेती से जुड़ी कार्यशालाओं में भी हिस्सा लिया। इसलिए मैंने वर्ष 2016 में नौकरी छोड़कर खेती करने का मन बनाया। मेरे इस निर्णय से परिवार के लोग खुश नहीं थे। नौकरी छोड़कर खेती करना उन्हें पसंद नहीं था। उनका कहना था कि खेती घाटे का सौदा साबित होती है। मैंने उन्हें तैयार कर लिया। परंपरागत खेती की जगह आधुनिक खेती शुरू की। अब खेती से अच्छा मुनाफा मिलने पर परिवार के लोग मेरे निर्णय से खुश हैं। पॉली हाउस में पहले खीरा-ककड़ी बोई। इसके बाद गुलाब की खेती शुरू की। बीगोद के फूलों की डिमांड जयपुर और अजमेर में ज्यादा है।

हरिभाई ने कोठासूज के साथ दीवाडांड़ी बनाई: रोज़, सुअर द्वारा संरक्षण होता है।

जूनागढ़ जिले के भेसान तालुका के खंभालिया गाँव के एक प्रयोगात्मक किसान हरिभाई थुमर ने अपनी कोठासुज से एक अनोखी दीवाडांड़ी बनाई है। इस दीवाडांड़ी की मदद से रोज़, सुअर समेत जानवरों ने उनके खेतों में आना बंद कर दिया है। इस दीवाडांड़ी के निर्माण की बात करें तो एक डिब्बे में चार्जिंग बैटरी और लाइट को फिट किया गया है। हवा से डिब्बा आसानी से घूम सके इसके लिए पंखे की बेरिंग का उपयोग किया गया हे और डिब्बे के पंख भी रखे गए हैं। रात को डिब्बे में राखी लाइट चालू की जाती है। डिब्बे की रचना ऐसी है कि यह सामान्य हवा के साथ भी घूमता है। इसलिए, बैटरी का प्रकाश फॉक्स भी पूरे क्षेत्र में चलता है। इस तरह से खेतमे रातभर फॉक्स होने की वजह से रोज़, सूअर जैसे जानवरो आते नहीं है। हरिभाई का कहना है कि इस तरह के देसी दीवाडांड़ी बनाने की लागत केवल 500 रुपये है। रोज़, सूअर जैसे जानवरों के कारण खेती को भारी नुकसान हो रहा है। इस वजह से किसानों को रातभर जागना पड़ता है। ऐसे जानवरों से रक्षा करने के लिए, किसान हजारों-लाखो रुपये की कीमत पर तार फेन्सिंग लगाते हैं। इस स्थिति में, हरिभाई की कोठासुज की कमाल से बनाई दीवाड़ाडी किसानों के लिए उपयोगी हो सकती हैं। इसके बारे में अधिक जानकारी के लिए हरिभाई थुमर के नंबर 9428240817 पर संपर्क कर सकते हैं।

असिस्टेंड प्रोफेसर की नौकरी छोड़ यह लड़की बनी किसान, खेती करके कमा रही है लाखों का मुनाफा

छत्तीसगढ़ के रायपुर से करीब 88 किलोमीटर दूर मुहसमूंद के बागबाहरा में रहनेवाली 27 वर्षीय वल्लरी चंद्राकर ने कंप्यूटर साइंस से एमटेक की पढ़ाई की है। वल्लरी ने अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई साल 2012 में पूरी कर बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर अपने करियर की शुरूआत की। एक दिन छुट्टियों में जब वहअपने गांव आईं तो उसने देखा कि लोग आज भी पुराने तरीके से ही खेती कर रहे हैं जिससे उन्हें बहुत कम मुनाफा मिल रहा है. वल्लरी ने साल 2016 में अपनी नौकरी छोड़कर खेती को अपना पेशा बना लिया। उसने करीब 15 एकड़ जमीन से खेती की शुरूआत की और उस जमीन पर सब्जियां उगाना शुरू किया। वल्लरी अपने गांव में टमाटर, सेम, खीरा, करेला, लौकी, मिर्च, बींस और शिमला मिर्च की खेती कर रही हैं. उनके खेतों में उगाई गई सब्जियां दिल्ली, भोपाल, इंदौर, उड़िसा, नागपुर और बैंगलुरु जैसे कई शहरों तक पहुंचाई जाती है। वल्लरी अपनी सब्जियों को दुबई और इजराइल तक एक्पोर्ट करने की तैयारी भी कर रही हैं। वल्लरी की टीम में शामिल 7 इंजीनियरिंग और मार्केटिंग क्षेत्रों के युवाओं ने उनके आइडिया को साकार रुप देने में अपना काफी योगदान दिया है। सब्जियों की खेती करके वल्लरी ना सिर्फ हर महीने लाखों की कमाई कर रही हैं बल्कि गांव के दूसरे लोगों को रोजगार भी प्रदान कर रही हैं। वल्लरी की इस तरक्की को देखकर उनके गांवं के आस-पास के दूसरे किसान भी उनसे खासा प्रभावित हो रहे हैं। बहरहाल खेती के लिए जब वल्लरी ने अपनी अच्छी खासी नौकरी छोड़ दी थी तब उन्हें लोगों ने पढ़ी-लिखी बेवकूफ कहा था लेकिन वल्लरी ने खेती करके लोगों के सामने यह मिसाल कायम की है कि एक लड़की भी खेती करके लाखों का मुनाफा कमा सकती है।

मिलिए खेती के 'मास्टर' से, जो ऑनलाइन कृषि मार्केटिंग से कमाते है लाखों रूपये

मिलिए खेती के 'मास्टर' से, जो ऑनलाइन कृषि मार्केटिंग से कमाते है लाखों रूपये उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से स्नातक की पढ़ाई कर रोजगार की तलाश न कर सोमवर्धन पांडेय ने वापस अपने गांव लौटकर खेती में कुछ ऐसा प्रयोग किया की जापान, थाईलैंड सहित अन्य देशों के कृषि विशेषज्ञों ने उनके गांव का दौरा ही नहीं किया बल्कि उनको मास्टर का दर्जा तक दे डाला। आज अपने गांव से ही इस तकनीक के माध्यम से देश ही नहीं दुनिया में अपने नाम के साथ देश में नाम रौशन कर रहे हैं। साथ-साथ ऑनलाइन मार्केटिंग के जरिये अपने प्रयोग को बाजार में बेच कर 25 लाख रुपये सालाना तक का कारोबार कर रहे हैं। वो खुद आर्थिक रूप से तो मजबूत हो ही रहे हैं, बेरोजगारों के लिए रहनुमा भी साबित हो रहे हैं। उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में स्थित मिहीपुरवा ब्लॉक में 4 हज़ार की आबादी वाला गांव कुड़वा है जहां सोमवर्धन पांडेय अपने परिवार के साथ रहते हैं।1999 में लखनऊ विश्विद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त करके नौकरी के पीछे न भागकर कृषि को अपना जीविकोपार्जन का साधन बनाने की ठानी। सोमवर्धन पांडेय ने कहा कि उद्यान विभाग के उद्यान निरीक्षक आरके वर्मा की मदद से 2004-05 में 10 हजार की लागत से 3 बीघे में ग्लैडियोलस की खेती की शुरुआत की, जिसके फूल बहराइच, लखनऊ व प्रदेश के अन्य शहरों में बिकने के लिए भेजे गए । उन्होंने बताया कि इससे मुझे 8 से 10 लाख रुपये की आय हुई थी। जिसकी वजह से मेरा औद्यानिक फसलों और कृषि क्षेत्र में नये-नये प्रयोग करते हुये फूलों की खेती की तरफ रुझान बढ़ा। हमने कृषि में नवीनतम तकनीक को अपनाते हुए फूलों की खेती को मानक बनाया। फूलों की खेती में मैं न सिर्फ मण्डी पर आधारित रहा बल्कि गोण्डा, बलरापुर, बहराइच, लखीमपुर, सीतापुर यहां के फुटकर फूल विक्रेताओं से भी सम्पर्क साधा। यही मेरी सफलता का मूल कारण बना। जिसकी वजह से प्रदेश के फूल उत्पादक कृषकों में मेरा अपना एक स्थान है। सोमवर्धन पांडेय आगे कहते हैं कि कुछ नया करने का जुनून खत्म नहीं हुआ और जापान की एक प्राचीन कला जिसको बोनसाई कहते हैं, उसके ऊपर रिसर्च करना शुरू किया। लगभग साल भर तक उसकी तकनीक पर गहराई से अध्यन करने के बाद उस पर काम करना प्रारम्भ किया. बोन का मतलब प्लेट और साई का मतलब पौधा रिसर्च में निकल कर आया। बड़े वृक्ष को छोटे रूप में प्लेट में ले आते हैं। इस तकनीक के हिसाब से एक पौधे में 8 साल तक का वक्तम लगता है। उन्होंने दवा किया की हमारे पास 40 साल पुराना पेड़ है जिसको हमने छोटा रूप देकर तैयार किया है। देश विदेश से इसकी लगातार डिमांड आ रही है। 5 लाख से अधिक तक देने को लोग तैयार हैं लेकिन हमने बेचा नहीं। वैसे अमूमन पौधे के 5 हज़ार से 12 हज़ार तक मिल जाते हैं। उनका का कहना था कि फूलों के बीज को कोल्ड स्टोरेज में रखना पड़ता है ताकि उसको अगले साल भी इस्तेमाल किया जा सके। आर्थिक हालत पर कहते हैं कि तीन भाइयों के सहयोग से हम 25 बीघे में इसकी खेती कर रहे हैं जिससे मेरा सालाना कारोबार 25 लाख रुपये का है। सोमवर्धन पांडेय सन्देश देते हुये कहते हैं कि शहरों में जिस तेज़ी के साथ आबादी से ऑक्सीजन की कमी हो रही है, अगर बोनसाई को शहरों में किसान पहुंचायेगा तो एक तरफ किसान की आर्थिक स्थिति अच्छी होगी और शहरों में ऑक्सीजन और सकरात्मक ऊर्जा बढ़ जाएगी किसान के जेब में पैसा होगा और शहरों में ऑक्सीजन। यही वजह है कि हमने अपने घर को बोन्साई से ऐसा मेंटेन किया है कि जिसको हरियाली कि जन्नत कहा जाता है। उन्होंने शहरों में बिमारियों को रोकने के लिए घरों में एरिका पाम, मनी प्लांट के साथ में इसनेक प्लांट, टंग प्लांट लगाने पर बल दिया और दवा किया किया कि जहां घर में इससे एक ओर ऊर्जा मिलेगी साथ में घर में 90 प्रतिशत बीमारी अपने आप खत्म हो जाएगी. उन्होंने आगे कहा कि अभी एक नई तकनीक बोगन बेलिया पर नया प्रयोग जारी है। साथ-साथ नीबू की सघन बागवानी, विभिन्न प्रकार के पौधों के बोनसाई तैयार करना व गेंदा, गुलाब, ग्लैडियोलस व सीजनल फूलों की खेती की जा रही है। उन्होंने कहा कि दुनिया मुझे एक बोनसाई मास्टर के रूप में जानती है और मेरी बोनसाई भारत के साथ-साथ दुनिया के हर कोने में ऑन-लाइन मार्केटिंग द्वारा जा रही है। और ऑन-लाइन मार्केटिंग प्रक्रिया के लिए कोई बड़ा स्टाफ नहीं रखा बल्कि खुद अपने घर से संचालित करता हूं। वर्तमान में मेरे द्वारा भोजपत्र, बरगद, पीपल, पाकड़, नीम, गुलर, बोगन बेलिया, फाइकस, पाम, जेड प्लान्ट (गुडलक प्लान्ट) जापानी पौधा आदि के पौधे बोनसाई तैयार किये जा रहें है। प्रति वर्ष मेरे द्वारा 8-10 लाख रुपये के बोनसाई तैयार कर बिक्रय किये जा रहे हैं। शिक्षित बेरोजगार उद्यान विभाग से नर्सरी उत्पादन का प्रषिक्षण प्राप्त कर इसको एक कुटिर उद्योग के रूप में अपना सकते हैं। बहराइच उद्यान विभाग के उद्यान निरीक्षक आरके वर्मा ने बताया कि सोमवर्धन पांडेय ने देश का नाम पूरी दुनिया में रौशन किया है आज उनकी कामयाबी और लगन को देखते हुए नौजवान कृषि के क्षेत्र कि तरफ लौट रहे हैं। उनका मानना है कि आज के भौतिक युग में लोगों के घरों में जगह काफी कम हो गयी है। इसलिये वे हमारे भारतीय संस्कृति के पौधे बोनसाई के रूप में लगाकर हरियाली का आनन्द लेने के साथ ही शहरों में प्रदूषित वातावरण में कम स्थान में हम अपनी पवित्र वनस्पति को जीवित रख सकते हैं और पूरे शहर के वातावरण स्वच्छ एवं ऑक्सीजन युक्त कर सकतें हैं। कहानी उस युवा किसान की जिसने नौकरी छोड़ खेती में बनाया करियर यह कहानी है सलेमपुर के समीप गोविन्दपुरा गांव के हंसपाल मीना की। 26 वर्षीय युवा किसान हंसपाल अब पशुपालन डेयरी के साथ खेती कर अच्छा मुनाफा कमा रहा है। स्नातक करने के बाद उसने बैंक की नौकरी के लिए तीन बार प्रयास किया, लेकिन साक्षात्कार में सफल नहीं हो सका। इसके बाद जयपुर में लो फ्लोर रोडवेज बस में परिचालक की नौकरी की, लेकिन रास नहीं आई और महज एक सप्ताह में छोड़कर गांव लौट आया और परिजनों को खेती करने की इच्छा जताई। मन में कृषक बन कुछ अलग करने की ठानी तो घर वालों का सहयोग नहीं मिला, जैसे-तैसे घर वालों को राजी भी किया तो फिर किस्मत ने साथ नहीं दिया और पहले ही प्रयास में लाखों का नुकसान झेलना पड़ गया, लेकिन उसने अपनी जिद के आगे हार नहीं मानी और शायद यही वजह रही कि अब वह एक सफल युवा किसान बनकर उभरा है। पहले प्रयास में ताईवान रेडलेडी पपीता लगाया, लेकिन प्रकृति की पड़ी मार (ओलावृष्टि) ने करीब डेढ़ लाख रुपए के घाटा दे दिया। लेकिन वह हताश नहीं हुआ और करीब तीन वर्ष पहले रसभरी फल की खेती शुरू की तो अच्छा मुनाफा भी कमाया। हंसपाल के अनुसार करीब तीन वर्ष पहले इंटरनेट पर ढूंढते-ढूंढते रसभरी की खेती रास आ गई। वर्ष 2015 में अपने खेत में से करीब 2 बीघा भूमि में रसभरी फल का बीज बो दिया, जो पहले ही वर्ष फायदे का सौदा साबित हुआ। दूसरे वर्ष दोनों भाईयों ने उसे बढ़ाते हुए तीन बीघा में बोया तो फिर अच्छी उपज और दाम मिले। इस वर्ष फिर फसल का रकबा बढ़ा दिया। वर्तमान में करीब चार बीघा भूमि में रसभरी फल की खेती लहलहा रही है। इसी के साथ हंसपाल ने पशुपालन कर डेयरी खोली। करीब दो दर्जन होल्सटीन फ्रीसिएन नस्ल की गाय और चार भैंसों के साथ डेयरी का संचालन कर रहे हंसपाल के अनुसार वर्तमान में करीब डेढ़ क्विंटल दूध की वह आपूर्ति कर रहा है। हंसपाल के अनुसार वह गंगापुर स्थित दुग्ध डेयरी, विद्यालयों में दूध की आपूर्ति की जा रही है। अब हंसपाल की ग्रीनहाउस का सपना संजोकर उसमें नई तकनीक से फल-सब्जी की पैदावार करना है।

कहानी उस युवा किसान की जिसने नौकरी छोड़ खेती में बनाया करियर

कहानी उस युवा किसान की जिसने नौकरी छोड़ खेती में बनाया करियर यह कहानी है सलेमपुर के समीप गोविन्दपुरा गांव के हंसपाल मीना की। 26 वर्षीय युवा किसान हंसपाल अब पशुपालन डेयरी के साथ खेती कर अच्छा मुनाफा कमा रहा है। स्नातक करने के बाद उसने बैंक की नौकरी के लिए तीन बार प्रयास किया, लेकिन साक्षात्कार में सफल नहीं हो सका। इसके बाद जयपुर में लो फ्लोर रोडवेज बस में परिचालक की नौकरी की, लेकिन रास नहीं आई और महज एक सप्ताह में छोड़कर गांव लौट आया और परिजनों को खेती करने की इच्छा जताई। मन में कृषक बन कुछ अलग करने की ठानी तो घर वालों का सहयोग नहीं मिला, जैसे-तैसे घर वालों को राजी भी किया तो फिर किस्मत ने साथ नहीं दिया और पहले ही प्रयास में लाखों का नुकसान झेलना पड़ गया, लेकिन उसने अपनी जिद के आगे हार नहीं मानी और शायद यही वजह रही कि अब वह एक सफल युवा किसान बनकर उभरा है। पहले प्रयास में ताईवान रेडलेडी पपीता लगाया, लेकिन प्रकृति की पड़ी मार (ओलावृष्टि) ने करीब डेढ़ लाख रुपए के घाटा दे दिया। लेकिन वह हताश नहीं हुआ और करीब तीन वर्ष पहले रसभरी फल की खेती शुरू की तो अच्छा मुनाफा भी कमाया। हंसपाल के अनुसार करीब तीन वर्ष पहले इंटरनेट पर ढूंढते-ढूंढते रसभरी की खेती रास आ गई। वर्ष 2015 में अपने खेत में से करीब 2 बीघा भूमि में रसभरी फल का बीज बो दिया, जो पहले ही वर्ष फायदे का सौदा साबित हुआ। दूसरे वर्ष दोनों भाईयों ने उसे बढ़ाते हुए तीन बीघा में बोया तो फिर अच्छी उपज और दाम मिले। इस वर्ष फिर फसल का रकबा बढ़ा दिया। वर्तमान में करीब चार बीघा भूमि में रसभरी फल की खेती लहलहा रही है। इसी के साथ हंसपाल ने पशुपालन कर डेयरी खोली। करीब दो दर्जन होल्सटीन फ्रीसिएन नस्ल की गाय और चार भैंसों के साथ डेयरी का संचालन कर रहे हंसपाल के अनुसार वर्तमान में करीब डेढ़ क्विंटल दूध की वह आपूर्ति कर रहा है। हंसपाल के अनुसार वह गंगापुर स्थित दुग्ध डेयरी, विद्यालयों में दूध की आपूर्ति की जा रही है। अब हंसपाल की ग्रीनहाउस का सपना संजोकर उसमें नई तकनीक से फल-सब्जी की पैदावार करना है।

प्रगतीशील महिला किसान ललिता को मोदी करेंगे सम्मानित

प्रगतीशील महिला किसान ललिता को मोदी करेंगे सम्मानित मध्यप्रदेश की महिला किसान ललिता मुकाती ने 36 एकड़ में जैविक पद्धति से चीकू, सीताफल और कपास का रिकार्ड उत्पादन कर दिखाया। यदि सब कुछ ठीक रहा तो जल्द ही वह इन जैविक फलों की निर्यातक भी बन जाएंगी।यही नहीं वे गांव की महिलाओं का समूह बनाकर उन्हें भी जैविक खेती के लिए प्रोत्साहित कर रही है। केंद्र सरकार ने उन्हें देश की उन 114 महिला किसानों में शामिल किया है, जिन्होंने भारतीय कृषि में बेहतरीन योगदान दिया है। इन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सम्मानित करेंगे। हालांकि अभी तारीख तय नहीं है। कुछ साल पहले तक 50 वर्षीय ललिता सुरेंशचंद्र सामान्य किसान परिवार में एक बहू, मां और पत्नी की जिम्मेदारी बखूबी निभा रही थीं। एमएससी एग्रीकल्चर की डिग्री लेकर पति ने उन्नत खेती शुरू की। उनकी इस पहल को वे करीब से देखती समझती रहीं। बैंकर और डॉक्टर बेटियों के करियर में व्यस्त होने के बाद 10 साल पहले उन्होंने खेती संभाली। वहीं से यह सफर शुरू हुआ। ललिता ने बताया कि उनके परिवार की करीब 100 एकड़ जमीन है। कृषि कार्य में पति का हाथ बंटाने को घर से खेतों तक पहुंचने के लिए उन्होंने पहले स्कूटी चलाना सीखी और धीरे-धीरे खेती के उपकरण भी। ट्रैक्टर चलाना भी सीखा। रासायनिक खादों के दुष्प्रभावों को देखते हुए तीन वर्ष पूर्व जैविक खेती करने का मन बनाया। इसके लिए 36 एकड़ जमीन में से 25 एकड़ में सीताफल, छह में चीकू और पांच एकड़ में कपास की फसल लगाई। वर्मी कम्पोस्ट, गौ मूत्र, छांछ, वेस्ट डी-कम्पोसर आदि का उपयोग किया। साथ ही खेत और घर में गोबर गैस प्लांट व सोलर पंप भी लगाए। मप्र शासन की योजना के तहत मुकाती दंपती ने जर्मनी और इटली जाकर वहां की जाने वाली आधुनिक व उन्न्त खेती की तकनीक भी सीखी। साथ ही जिले के कृषि विज्ञान केंद्र व देश में कई स्थानों पर जैविक खेती की कार्यशालाओं व प्रशिक्षण में भाग लिया। दो वर्ष पूर्व 36 एकड़ जैविक खेती वाले हिस्से का पंजीयन मप्र जैविक प्रमाणीकरण बोर्ड में भी कराया। सुरेशचंद्र मुकाती ने बताया कि पंजीयन पश्चात प्रतिवर्ष बोर्ड द्वारा खेत का सूक्ष्म निरीक्षण किया जा रहा है। अगले वर्ष निरीक्षण पश्चात जैविक खेती का प्रमाणित होने पर जैविक खेती के उत्पाद विदेशों को निर्यात कर सकेंगे। वर्तमान में जैविक सीताफल व चीकू महाराष्ट्र, गुजरात सहित दिल्ली तक बेच रहे हैं। इनका भाव सामान्य फलों की तुलना में लगभग डेढ गुना मिलता है। विकास जंगरा और विवेक पराशर ने बताया कि दिल्ली में जल्द ही होने वाले रियलिटी शो और अवॉर्ड के आयोजन की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। आयोजन में 114 कृषक महिलाओं में से चयनित तीन महिलाओं को विशेष पुरस्कार भी दिए जाएंगे।